Monday, December 20, 2010

नाकाम नीतियों की त्रासदी

लेखक आतंकवाद से मुकाबले की नीतियों का खोखलापन उजागर कर रहे हैं ..

 लेट अस फील द पेन यानी आइए दर्द महसूस करें-यह संदेश इंडियन मुजाहिदीन ने शीतला घाट वाराणसी के धमाके के बाद भेजा है। वे उस समाज को दर्द महसूस कराना चाहते हैं जिसकी त्रासदी का अंत ही नहीं हुआ है। पिछली बहुत-सी शताब्दियों में हमने जितना दर्द देखा है वह दुनिया की किसी भी सभ्यता के दर्द के खाते से कहीं अधिक है। हमें मासूम स्वास्तिका की शहादत का दर्द है। ऐसा ही दर्द करबला में दसवीं मुहर्रम को मासूम अली असगर की शहादत का है, जो हमेशा हमारे साथ हैं। इस्लाम की यह जंग यजीद के आतंक का जवाब थी। उनके संदेश को थोड़ा बदल देना चाहता हूं-लेट अस फील द पेन टुगेदर यानी आइए साथ-साथ दर्द महसूस करें। इतिहास के रास्तों पर हम दर्द के बहुत से पड़ावों से साथ-साथ गुजरे हैं। दर्द बाबरी मस्जिद का हो या सोमनाथ का, वह हमारे समाज का साझा दर्द है। चाहे सिकंदर का हमला रहा हो या नादिरशाह का या 1857 की जंगे आजादी की मुहिम रही हो, हमने हमेशा से साझा दर्द महसूस किया है। ये धमाके हमें हमारी कमजोरियों का अहसास कराते हैं। आतंकी उम्मीद करते हैं कि हिंदू समाज में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसक प्रतिक्रिया हो, जिससे इन्हें भरती के लिए स्थानीय युवक मिल सकें। लश्कर और आइएसआइ का काम भारत में बची-खुची पाकिस्तान मानसिकता को पाल-पोस कर बड़ा करना है। जातीय, क्षेत्रीय समस्याओं में उलझा भारत, पाकिस्तान और चीन के भी हितों के बहुत अनुकूल बैठेगा। अफसोस यह है कि अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देश की नीतियां भी सशक्त भारत के विरुद्ध रही हैं। अमेरिका की बाजारवादी सोच भी शायद कमजोर भारत चाहती है। न जाने क्यों वह हमारी रणनीतिक संभावनाएं नहीं देख पा रहा है? उसे चीन के मुकाबिल एशिया में एक मजबूत साझीदार की आवश्यकता है। विकिलीक्स ने दिखाया है कि अमेरिकी सोच की क्या सीमाएं हैं और पाकिस्तान तंत्र के सामने अमेरिका कितना असहाय महसूस करता है। 1971 के युद्ध में उसने पाकिस्तान को बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया। वरना हो सकता था कि इस देश को सांप्रदायिक समस्या से हमेशा के लिए निजात मिल जाती। यही दिसंबर का महीना 1971 में पाकिस्तान के समापन और सिंध, पख्तूनिस्तान और बलूचिस्तान की भी आजादी की तारीख हो सकता था, लेकिन नहीं, अमेरिकी हमें इस प्रकार नियंत्रित करना चाहते हैं जिससे पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के समीकरण न बिगड़ें। वे सोच ही नहीं पाते कि इस इलाके में सारी समस्याओं की जड़ में सिर्फ पाकिस्तान है। हमें ध्यान रखना होगा कि समस्या पाकिस्तान की जनता नहीं है। समस्या सिर्फ वह गैरजिम्मेदार शासन प्रबंधतंत्र है, जो पाकिस्तान में प्रारंभ से ही प्रभावी रहा है। पाकिस्तान कोई राष्ट्र नहीं है, बल्कि शासन प्रबंधतंत्र एवं सेनाएं ही पाकिस्तान है। यदि जनता को पाकिस्तानी प्रबंधतंत्र और सेनाओं से मुक्ति दी जा सके तो सिंधु का यह इलाका खुशहाली और समृद्धि का महान क्षेत्र हो जाएगा। अंग्रेजों ने भारत की विभाजन रेखा के समान भारत और अफगानिस्तान के बीच एक नकली सीमा डूरंड रेखा खींचकर पख्तूनों को दो देशों में बांट दिया। अमेरिका, जो अरबों डालर की मदद पाकिस्तानी प्रबंधतंत्र को दे रहा है उससे कहीं कम में पख्तून समाज का स्वप्न पूरा हो जाएगा। अगर इस इलाके में आतंकवाद की आधारभूमि को समाप्त करना है तो उचित होगा कि अमेरिकी बलूचों, पख्तूनों के मित्र बनें, शत्रु नहीं। अमेरिकी नीति नियंताओं ने बांग्लादेश में हाथ जलाकर भी कोई सबक नहीं लिया है। अप्रैल 1971 में ढाका विश्वविद्यालय में बुद्धिजीवियों की सामूहिक हत्याओं पर अमेरिकी जनरल आर्चर ब्लड लगभग विद्रोह कर किसिंजर को खरी-खोटी सुनाता है। हत्याओं की बात सुनकर संवेदनशून्यता की पराकाष्ठा पर पहंुचे किसिंजर सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि क्या हार्वर्ड में उनका छात्र रहा अब्दुल रज्जाक भी मार डाला गया? लोकतांत्रिक अमेरिका इस जनविद्रोह को दरकिनार कर यथास्थिति बनाए रखने के लिए बंगाल की खाड़ी में सातवां बेड़ा भेजता है। बावजूद लाख कोशिशों के वह बांग्लादेश का उदय नहीं रोक सका। उसे अपनी रणनीति की समीक्षा की तत्काल आवश्यकता है। बांग्लादेश जैसी ही गलती वह आज पख्तून, बलूच एवं सिंधु क्षेत्र में कर रहा है। उसने पाकिस्तान के परमाणु बम कार्यक्रम की जानबूझकर अनदेखी की कि इससें पाकिस्तान की क्षेत्रीय स्थिरता समाप्त होगी। अब अमेरिका उन्हीं एटम बमों के आतंकियों के हाथ पड़ने से भयभीत हो रहा है। इससे उनकी अपरिपक्व सोच का पता चलता है। पाकिस्तान तंत्र अपने समापन से पहले आत्मघाती हमलावर की तरह जिस्म से बंधे बम को ब्लास्ट कर भारत का अधिक से अधिक नुकसान करना चाहेगा। अगर अल्लाह ने जिन्ना को सिर्फ पांच वर्ष की जिंदगी और दी होती तो उन्हें हम पाकिस्तान तंत्र के विरुद्ध संघर्ष करते हुए देखते। पाकिस्तान तो राजनीतिक सौदेबाजी के रूप में मजबूरन उनके हाथ पड़ गया था। भारत के कुछ नेताओं की दक्षिणपंथी सोच ने इसे मुसलमानों से फुर्सत पाने के एक अवसर के रूप में देखा होगा। दिनोंदिन बढ़ते हुए धमाके और जातीय वैमनस्य पाकिस्तान को आज उस हिंसक अंत की ओर ले जा रहे हैं जैसा कि गत दशकों में यूगोस्लाविया का हुआ है। पाकिस्तान के समापन का अर्थ पाकिस्तान के अवाम की उस आजादी से भी है, जो उसे 1947 में नहीं मिली। हम तो आजाद हुए, लेकिन पाक जनता नकली लोकतंत्र और सेनाओं की गुलाम बन गई। वाराणसी की हैसियत सनातन एवं बौद्ध धर्म के लिए वही है जो ईसाइयों के लिए वैटिकन सिटी की है। आस्था के केंद्रों को युद्धों से बचाया जाए वरना जब जुनून चढ़ जाएगा तब किसी को एटम बमों का भी खौफ न होगा। एटम बमों के हमलों से तबाह होने के बावजूद यह देश मरेगा नहीं, न समर्पण करेगा और न हारेगा। कौन है स्वास्तिका की मौत का जिम्मेदार? स्थानीय प्रशासन? जी नहीं। जिम्मेदार वे नीतियां हैं जो आतंक के पोषक पाकिस्तान और उसके मजबूर सहयोगी अमेरिका को जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। 1947 से ही पाकिस्तानी गुंडागर्दी को बरदाश्त करना हमारी पहचान बन चुकी है। आतंकवादियों ने गुडि़यों से खेलने वाली अबोध स्वास्तिका का नाम राहे शहादत में दर्ज करा दिया है। स्वास्तिका बहुत प्यारा सा नाम है। हमारी बहुत सी बच्चियों का नाम अब से यही रखा जाएगा। स्वास्तिका अब सिर्फ बनारस की ही नहीं, सारे भारत की बेटी हो गई है। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)

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