Friday, December 31, 2010

लश्कर-ए-तैयबा के नक्शेकदम पर सिमी

स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के नए नाम के साथ सक्रिय होने और उत्तरी भारत से दक्षिणी भारत हस्तांतरित होने की खबरें न केवल इसलिए ध्यान देने योग्य है कि महत्वपूर्ण नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद इस संगठन का वजूद बरकरार है, बल्कि इसलिए भी है कि इस पर पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का प्रभाव बिल्कुल साफ नजर आता है। अपना वजूद बरकरार रखने के लिए उसने लश्कर का ही तरीका अपनाया है। पाकिस्तान में प्रतिबंधित होने के बाद लश्कर-ए-तैयबा पाकिस्तान में अलग-अलग नाम से अलग-अलग जगहों पर सक्रिय है, उसी तरह सिमी के भारत में सक्रिय होने की खबरें हैं। पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और इंडियन मुजाहिदीन को अगर सिमी की उपज समझा जा रहा है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। इस सिलसिले में खुफिया एजेंसियों और मीडिया के पास ठोस सबूत भले ही नहीं है मगर इन संगठनों द्वारा जो कारनामें अंजाम दिए जा रहे हैं, वह सिमी के उसूलों के जीवित होने की ही पुष्टि करते हैं। हाल ही में धार्मिक नगरी वाराणसी में शीतला घाट पर हुए धमाके में हालांकि नुकसान कम हुआ है, लेकिन उसकी दहशत अब भी मौजूद है। एक सूचना के अनुसार इस धमाके के बाद शहर के पर्यटन और अन्य उद्योग बुरी तरह प्रभावित हैं। धमाके में इंडियन मुजाहिदीन का हाथ बताया जा रहा है। इससे पहले केरल में दिल दहला देने वाली घटना सामने आई थी। अर्नाकुलम जिले में तथाकथित रूप से इस्लाम को बदनाम करने वाला प्रश्नपत्र बनाने के लिए एक प्रोफेसर का हाथ काट दिया गया था। यह कारनामा पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने अंजाम दिया था। अगर हम और पीछे जाएं तो बेंगलूर और अहमदाबाद में हुए धमाके और सूरत में विस्फोटकों से लदे ट्रक तथा 18 बम मिलने के सवाल अभी भी उलझे हुए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सबका रिमोर्ट पाकिस्तान में ही है? केंद्रीय जांच ब्यूरो के पूर्व निदेशक जोगेन्द्र सिंह के अनुसार भारत में होने वाले आतंकवादी हमलों की योजनाएं पाकिस्तान में ही बनती हैं। उन्होंने कहा है कि कारगिल युद्घ के दौरान हमारे 400 जवान शहीद हुए थे और हमने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया था। जबकि गत 20 वर्षों में लगभग 64,000 लोग आतंकवाद से किसी न किसी तरीके से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को गुप्तचर तंत्र को मजबूत करना पडे़गा। पूरी दुनिया में आतंकवाद से संबंधित कानून में संशोधन हुआ है और भारत में भी इस कानून को सख्त बनाने की जरूरत है। जांच से संबंधित एजेंसियां पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और इंडियन मुजाहिदीन को लेकर असमजंस में हैं। वह यह मानकर काम कर रही हैं कि आतंकवाद से जुड़े नेटवर्क ने दोनों संगठनों का नाम लश्कर और सिमी की ओर से ध्यान हटाने के लिए उछाला है। उनकी सोच गलत भी नहीं लगती। गुप्तचर ब्यूरो के अनुसार बेंगलूर और अहमदाबाद में हुए धमाकों की साजिश कराची में रची गई थी। रसूल खान पारती और सूफिया अहमद परतिंज्ञा ने दोनों शहरों में हुए बम धमाको का नक्शा बनाया था। रेडइफ डॉट ने आइबी के हवाले से यह खबर दी थी। खबर में कहा गया था कि दोनों मास्टरमाइंड कराची में रहते हैं। दोनों के बारे में यह भी मालूम हुआ है कि वे हरकत उल मुजाहिदीन इस्लाम के सदस्य हैं। इस बीच आतंकवाद पर जारी बहस का नई दिशा लेना बहुत खतरनाक नजर आ रहा है। अब तक यह बहस जारी थी कि आतंकवाद किस तरह समाप्त किया जाए? लेकिन अब यह बहस शुरू हो गई है कि किस धर्म का आतंकवाद अधिक खतरनाक है ? क्या आतंकवाद का भी कोई धर्म होता है? धर्म के नाम पर आतंकवाद फैलाने की बात तो किसी हद तक ठीक है। लेकिन आतंकवाद फैलाने वाले धार्मिक हैं, यह बात बिल्कुल ठीक नहीं है। क्योंकि कोई भी धर्म किसी निर्दोष की हत्या की अनुमति नहीं देता। जबकि आतंकवाद का निशाना बनने वाले अधिकतर निर्दोष ही होते हैं। (अडनी)

Tuesday, December 28, 2010

वर्दी के दम पर असलहों की मंडी बना यूपी

हाल फिलहाल की घटनाएं साबित करती हैं कि यूपी असलहों की खरीद-फरोख्त का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। महफूज ठिकाना मानकर अंतरराज्यीय गिरोहों ने यहां की राह पकड़ ली है। वजह यह है कि डाल-डाल, पात-पात के खेल में तस्करों ने नकेल कसने वाली संस्था के घर में ही सेंध लगाकर कुछ वर्दी वालों को भी अपनी जमात में शामिल कर लिया है। अंतरराज्यीय असलहा तस्कर रामप्रताप भदौरिया और मनवीर कैथू को एसटीएफ ने रविवार को गिरफ्तार किया तो उसके पास गिनाने के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन गुजरे बुधवार को बदायूं में अपराधी प्रवृत्ति के दरोगा संजय राय के घर से बरामद असलहों का जखीरा शर्माने का सबब भी था। इस जखीरे में एलएमजी और ग्रेनेड जैसे हथियार भी थे। जाहिर है कि एक दशक के अंदर इस धंधे में वर्दीकलंकित होती रही है। वर्ष 2004 में मिर्जापुर पीएसी के शस्त्रागार में गिनती में करीब एक लाख कारतूस कम पाए गए। वहां तैनात हेड आरमोरर को गिरफ्तार किया गया। 2008 में इसका वृहद रूप सामने आया जब रामपुर से लेकर बलिया तक पुलिस के शस्त्रागारों से कारतूस और असलहे गायब मिले, तब वहां तैनात आरमोररों के चेहरे का नकाब उतर गया। प्रदेश में कई जिलों के आरमोररों की संलिप्तता उजागर हुई और उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। आतंकियों और नक्सलियों से भी इनके रिश्ते जगजाहिर हो गए। अपराधियों को वर्दी के जरिए असलहा आपूर्ति की बात कोई नई नहीं है। 1967 में गोरखपुर पुलिस लाइन से बिहार के दियारा क्षेत्र के जल दस्यु सुदामा मण्डल को कारतूस आपूर्ति के मामले में एक पुलिसकर्मी पकड़ा गया। बाद में पुलिस और पीएसी से बर्खास्त कई सिपाहियों ने आपराधिक गिरोह संचालित करके सियासी राह पकड़ ली, लेकिन इस धंधे से उनकी डोर बंधी रही। यह भी किसी से छिपा नहीं है। असल में नेपाल की खुली सीमा इस धंधे को परवान चढ़ाने में सबसे कारगर साबित हुई। दूसरे, बिहार के अपराधियों और आइएसआइ की निरंतर बढ़ती घुसपैठ ने भी इसे विस्तार दिया है। इसीलिए यूपी में असलहों का क्रेज भी बढ़ने लगा है।

आतंकियों से नए साल पर ताज को खतरा

आतंकवादियों की नजर किसी ताज पर है। जहां ये नए साल के मौके पर कहर बरपाना चाहते हैं। इसमें मुंबई के ताज होटल सहित इस नाम की कोई और जगह भी शामिल हो सकती है। नए साल के मौके पर गृह मंत्रालय ने देश के सभी प्रमुख शहरों को सतर्क रहने को कहा है। गृह मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी के मुताबिक आतंकवादियों की तैयारी के बारे में मिली खुफिया सूचना के मुताबिक उनकी योजना ताज पर हमला करने की है। पिछली बार उन्होंने मुंबई के ताज होटल को निशाना बनाया था। इसलिए मुमकिन है कि इस बार वे इससे मिलते-जुलते नाम वाली किसी जगह को निशाना बना सकते हैं। इस तैयारी में नाकाम रहने की स्थिति में आतंकवादी देश के किसी दूसरे प्रमुख शहर पर भी निशाना लगा सकते हैं। खुफिया सूचनाओं के आधार पर गृह मंत्रालय ने नए साल के मौके पर देश भर के तमाम बड़े शहरों में हो रहे आयोजनों की सुरक्षा के लिए अलर्ट जारी कर दिया है। दैनिक जागरण में रविवार को छपी खबर में पहले ही बता दिया था कि गृह मंत्रालय ने क्रिसमस से ठीक पहले अलर्ट जारी कर जनवरी के पहले हफ्ते तक सतर्क रहने को कहा है। राज्यों को कहा गया है कि इस मौके पर बड़े होटलों और क्लबों के अलावा शॉपिंग मॉल और बाजारों पर भी कड़ी निगरानी रखें। इसके अलावा खास कर बड़े बैग लेकर दाखिल हो रहे लोगों की तलाशी लें। क्योंकि खुफिया सूचना के मुताबिक इस बार ये बम छुपा कर भागने की बजाय सीधा हमला करने की तैयारी से आए हैं। गोवा के मामले में विशेष अलर्ट पहले ही जारी कर दिया गया था क्योंकि वहां अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव चल रहा है और राज्य अपनी 50वीं वर्षगांठ भी मना रहा है। गोवा में सुरक्षा इंतजाम मजबूत करने के इरादे से केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अ‌र्द्धसैनिक बलों की अतिरिक्त कंपनियां वहां भेजी हैं। वाराणसी विस्फोट और जामा मस्जिद गोलीकांड जैसी घटनाओं में कोई साक्ष्य नहीं मिलना या आरोपियों का नहीं पकड़ा जाना चिंता का विषय है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों को विशेष एहतियात बरतने को कहा गया है।

Sunday, December 26, 2010

माओवाद के समर्थकों का सच

डॉ. विनायक सेन प्रकरण के संदर्भ में माओवाद के वैचारिक समर्थन से जुड़ी बहस आगे बढ़ा रहे हैं लेखक...

नहीं, कोई ऐसा नहीं कर सकता कि वह डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों को रायपुर की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास दिए जाने पर खुशी मनाए। वैचारिक विरोधों की भी अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा देश में अभी और भी अदालतें हैं। हमें अपनी अदालतों और अपने तंत्र पर भरोसा तो करना ही होगा। आखिर क्या अदालतें हवा में फैसले करती हैं? क्या इतने ताकतवर लोगों के खिलाफ सबूत गढ़े जा सकते हैं? ये सारे सुविधा के सिद्धांत हैं कि फैसला आपके हक में हो तो सब कुछ अच्छा और न हो तो अदालतें भरोसे के काबिल नहीं हैं। भारतीय संविधान, जनतंत्र और अदालतों को न मानने वाले विचार भी यहां राहत की उम्मीद करते हैं। दरअसल यही लोकतंत्र का सौंदर्य है। यह लोकतंत्र का ही सौंदर्य है कि रात-दिन देश तोड़ने के प्रयासों में लगी ताकतें भी हिंदुस्तान के तमाम हिस्सों में अपनी बात कहते हुए आराम से घूम रही हैं और देश का मीडिया का भी उनके विचारों को प्रकाशित कर रहा है। माओवाद को जानने वाले जानते हैं कि यह आखिर लड़ाई किस लिए है। इस बात को माओवादी भी नहीं छिपाते कि आखिर वे किसके लिए और किसके खिलाफ लड़ रहे हैं? बहुत साफ है कि उनकी लड़ाई हमारे लोकतंत्र के खिलाफ है और 2050 तक भारतीय राजसत्ता पर कब्जा करना उनका घोषित लक्ष्य है। यह बात सारा देश समझता है, किंतु हमारे मासूम बुद्धिवादी नहीं समझते। वे माओवादी आतंक को जनमुक्ति और जनयुद्ध जैसे खूबसूरत नाम देते हैं। झूठ, फरेब और ऐसी बातें फैलाना जिससे नक्सलवाद के प्रति मन में सम्मान का भाव का आए, यही माओवादी समर्थक विचारकों का लक्ष्य है। नक्सलवाद को जायज ठहराते बुद्धिजीवियों ने किस तरह मीडिया और मंचों का इस्तेमाल किया है इसे देखना है तो अरुंधति राय को समझने की जरूरत है। यह सही मायने में मीडिया का ऐसा इस्तेमाल है जिसे राजनेता और प्रोपेगेंडा की राजनीति करने वाले अक्सर इस्तेमाल करते हैं। आप जो कहें उसे उसी रूप में छापना और दिखाना मीडिया की जिम्मेदारी है, किंतु कुछ दिन बाद जब आप अपने कहे की अनोखी व्याख्याएं करते हैं तो मीडिया क्या कर सकता है। अरुंधती राय एक बड़ी लेखिका हैं। हर कहे गए वाक्य की नितांत उलझी व्याख्याएं हैं। जैसे 76 सीआरपीएफ जवानों की मौत पर वे दंतेवाड़ा के लोगों को सलाम भेजती हैं। आखिर यह सलाम किसके लिए है-मारने वालों के लिए या मरने वालों के लिए। ऐसी बौद्धिक चालाकियां किसी हिंसक अभियान के लिए कैसी मददगार होती हैं, इसे वे बेहतर समझते हैं जो शब्दों से खेलते हैं। आज देश में इन्हीं तथाकथित बुद्धिजीवियों ने ऐसा भ्रम पैदा किया है कि जैसे नक्सली कोई महान काम कर रहे हों। अरुंधति राय के एक लेख को पढि़ए और बताइए कि वह किसके साथ हैं? वह किसे गुमराह कर रही हैं। अरुंधति इसी लेख में लिखती हैं-क्या यह ऑपरेशन ग्रीन हंट का शहरी अवतार है? जिसमें भारत की प्रमुख समाचार एजेंसी उन लोगों के खिलाफ मामले बनाने में सरकार की मदद करती है जिनके खिलाफ कोई सबूत नहीं होते? क्या वह हमारे जैसे कुछ लोगों को वहशी भीड़ के सुपुर्द कर देना चाहती है? ताकि हमें मारने या गिरफ्तार करने का कलंक सरकार के सिर पर न आए? आखिर अरुंधति यह करूणा भरे बयान क्यों जारी कर रही हैं? उन्हें किससे खतरा है? महान लेखिका अगर सच लिख और कह रही हैं तो उन्हें भयभीत होने की जरूरत नहीं है। नक्सलवाद के खिलाफ लिख रहे लोगों को भी यह खतरा हो सकता है। सो खतरे तो दोनों ओर से हैं। नक्सलवाद के खिलाफ लड़ रहे लोग अपनी जान गवां रहे हैं, खतरा उन्हें ज्यादा है। भारतीय सरकार, जिसके हाथ अफजल और कसाब को भी फांसी देते हुए कांप रहे हैं वह अरुंधति राय या उनके समविचारी लोगों का क्या दमन करेंगी। अरुंधति के मुताबिक माओवादी कारपोरेट लूट के खिलाफ काम कर रहे हैं। वह पता करें कि नक्सली कारपोरेट लाबी की लेवी पर ही गुजर-बसर कर रहे हैं। नक्सल इलाकों में आप अक्सर जाती हैं, पर माओवादियों से ही मिलती हैं कभी वहां काम करने वाले तेंदुपत्ता ठेकेदारों, व्यापारियों, सड़क निर्माण से जुड़े ठेकेदारों, नेताओं और अधिकारियों से मिलिए. वे सब नक्सलियों को लेवी देते हुए आराम से खा और पचा रहे हैं। आदिवासियों के वास्तविक शोषक लेवी देकर आज नक्सलियों की गोद में बैठ गए हैं। ये इलाके लूट के इलाके हैं। आप इस बात का भी अध्ययन करें, नक्सलियों के आने के बाद आदिवासी कितना खुशहाल या बदहाल हुए हैं। आप नक्सलियों के शिविरों पर मुग्ध हैं, कभी सलवा जुडूम के शिविरों में भी जाइए। आपकी बात सुनी, बताई और छापी जाएगी, पर इन इलाकों में जाते समय किसी खास रंग का चश्मा पहन कर न जाएं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, December 22, 2010

हिमाचल में आतंक की पदचाप

प्राकृतिक सौंदर्य, शांति और पवित्रता का पर्याय माना जाने वाला हिमाचल प्रदेश भी अब दहशतगर्दो के खौफ के साये में आ गया है। हाल ही में वहां हिजबुल मुजाहिदीन जैसे खतरनाक संगठन के दो आतंकवादी पकड़े गए। ये आतंकी वहां एक ठेकेदार के पास मजदूर की तरह रह रहे थे। आशंका यह भी जताई जा रही है कि ये दोनों उत्तराखंड में गिरफ्तार आतंकियों के फरार साथी हैं। हिमाचल प्रदेश की पुलिस ने इन आतंकियों को गिरफ्तार करने में जो सतर्कता और तत्परता दिखाई है, उसके लिए निश्चित रूप से उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, लेकिन यह बात भी साथ ही समझी जानी चाहिए कि यह धमक दूसरे प्रांतों में देखी जा रही आतंक की धमक की तरह सामान्य बात नहीं है। दुर्गम रास्तों और खोह-कंदराओं से भरे हिमाचल प्रदेश तक आतंकवादियों की पहुंच से यह जाहिर होता है कि उनकी नजर देश के चप्पे-चप्पे पर है। अगर यहां आतंकवादियों ने कहीं अपना ठिकाना बनाना शुरू कर दिया तो यह पुलिस और सुरक्षाबलों के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द साबित होगा। इसलिए इस घटना को बिलकुल हल्के ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए। सरकार को इस पर तुरंत गंभीर होना चाहिए और तत्काल एक पुख्ता रणनीति तैयार करनी चाहिए। ध्यान रहे, हाल ही में वाराणसी में गंगा तट पर विस्फोट कर आतंकवादियों ने वहां अपनी पहुंच होने की खबर दी है। यह बात भी कोई मामूली नहीं है। बनारस सिर्फ भारत की सांस्कृतिक राजधानी ही नहीं, सांप्रदायिक सौहा‌र्द्र की जीवंत मिसाल भी है। इतिहास की बात छोड़ दें, तो सन् 2006 और अभी हाल में हुए विस्फोटों के बाद भी बनारस ने सहिष्णुता और सौहा‌र्द्र का जैसा उदाहरण पेश किया, वह मामूली बात नहीं है। आखिर वहां विस्फोट कर और निर्दोष लोगों की जानें लेकर दहशतगर्द क्या जताना चाहते हैं? बात केवल बनारस की ही नहीं है, उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी पहले वे अपनी पहुंच की सूचना दे चुके हैं। वहां अपनी धमक जता कर वे आगे क्या जताना चाहते हैं? उत्तराखंड में भी आतंकवादी पकड़े जा चुके हैं। जाहिर है, वे वहां भी कोई अच्छे काम करने नहीं, दहशत फैलाने के लिए आधार बनाने ही गए होंगे। अब उनकी धमक हिमाचल तक पहुंच गई। हिमाचल में आतंकवादियों के पकड़े जाने का सीधा मतलब यही है कि वे वहां अपनी पैठ के इंतजाम बनाने और इस शांतिपूर्ण प्रदेश को भी आतंक की चपेट में लेने के इरादे से ही गए थे। हिमाचल के दो पड़ोसी प्रदेश पंजाब और जम्मू-कश्मीर पहले से ही दहशतगर्दो के खौफ में हैं। यह अलग बात है कि पंजाब से आतंक का नामो-निशान तक पूरी तरह मिटाया जा चुका है, पर आईएसआई की नजर अभी भी वहां से हटी नहीं है। यही वजह है कि जब-तब वे वहां आतंक की पैठ फिर से कायम करने के लिए अपने पुराने गुर्गो को इक्का-दुक्का भेजते रहते हैं। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई आतंकवादियों के अलावा पाकिस्तानी जासूस भी पंजाब में पकड़े जा चुके हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद वे पंजाब में दोबारा अपनी पैठ बना नहीं पा रहे हैं। दूसरी तरफ, कश्मीर में भी उनकी स्थिति दिन--दिन दयनीय होती जा रही है। आम जनता पर उनका आतंक जरूर कायम है, लेकिन उनके प्रति किसी की कोई सहानुभूति नहीं है। आईएसआई के टुकड़ों पर पलने वाले कुछ लोग जरूर उनके इशारों पर नाच रहे हैं और वही उनके नापाक मंसूबों को कामयाब बनाने की कोशिशों में लगे हुए हैं, लेकिन उनकी कोशिशें गीदड़भभकी से अधिक कुछ साबित नहीं हो पा रही हैं। जाहिर है, इससे वे बौखलाए हुए हैं। ऐसा लगता है कि इसी बौखलाहट के चलते वे अपनी रणनीति में बदलाव कर रहे हैं। कश्मीर के अलावा दूसरे प्रदेशों में जो वे पैर पसारने और जब-तब विस्फोटों के जरिये वहां अपने होने की सूचना दे रहे हैं, वह इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा है। शायद वे पुलिस और सुरक्षाबलों का ध्यान वहां से हटाना चाहते हैं। उनकी मंशा क्या है, यह जानना बहुत जरूरी है। इसके लिए हमें अपने खुफिया तंत्र को तो बहुत मजबूत और सक्ति्रय बनाना ही होगा, साथ ही सुरक्षातंत्र को भी अधिक मजबूत करने की जरूरत है। देश के हर हिस्से पर पूरी निगरानी रखने और आतंकवादियों के संबंध में किसी प्रकार की कोई सूचना मिलते ही तुरंत कार्रवाई करने में जुट जाना चाहिए। इसके लिए देश के सभी प्रदेशों की पुलिस के बीच आपसी संवाद की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। इधर केंद्र सरकार ने भगोड़े आतंकियों को पकड़ने के लिए एक विशेष दल का गठन किया है। उन्होंने सभी प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों को फरार आतंकियों की सूची भी भेज दी है, लेकिन दहशतगर्दो को पकड़ने के लिए सिर्फ इतना ही पर्याप्त नहीं होगा। केंद्र की यह योजना सफल हो सके, इसके लिए जरूरी है कि हम अपने प्रशासनिक तंत्र के अन्य हिस्सों में भी नियम-कानून के मामले में सख्ती लाएं और उन्हें मजबूत बनाएं। ध्यान रहे कि हिमाचल प्रदेश में पकड़े गए आतंकवादियों की तलाश जम्मू-कश्मीर पुलिस को भी थी। क्योंकि ये जम्मू-कश्मीर में कई वारदातों को अंजाम दे चुके हैं। हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र ने भी इस मामले में जैसी तत्परता दिखाई है, वह सीख लिए जाने लायक है। वहां भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड और बिजली बोर्ड ने भी तुरंत अपनी सभी जल विद्युत परियोजनाओं पर हाई एलर्ट जारी कर दिया है। यह बात सर्वविदित है कि देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय दहशतगर्द कहीं न कहीं से फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड या पासपोर्ट आदि हासिल कर लेते हैं। ये पहचान पत्र हमेशा फर्जी ही नहीं होते। कई बार अन्य फर्जी कागजात का इस्तेमाल करके ये असली पहचान पत्र भी विभागीय लोगों की मिलीभगत से प्राप्त कर लिए जाते हैं। इसके लिए कई विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना होगा। सच तो यह है कि जब तक हम भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाते और सभी प्रदेशों की पुलिस व प्रशासन के बीच आपसी सहयोग की प्रक्ति्रया को पूरी तरह प्रभावी नहीं बनाते हैं, तब तक इससे पार पाना बहुत मुश्किल है। इस दिशा में यूनिक आइडी की योजना बहुत कारगर साबित हो सकती है। लंबे समय से सुना जा रहा है कि इस पर बड़ी तेजी से काम चल रहा है, लेकिन अभी तक यह कहीं मूर्त रूप नहीं ले पाई है। यह मूर्त रूप ले सके, इसके लिए प्रक्ति्रया को तेज करने की जरूरत है। साथ ही, सभी तरह के आतंकवादियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाना भी अनिवार्य हो गया है। यह बात अब साबित हो चुकी है कि आतंकवादी चाहे किसी भी तरह के क्यों न हों, उन्हें शांति और सुलह की भाषा समझ में ही नहीं आती है। वे नरमी से कभी मानने वाले नहीं हैं। उन्हें सिर्फ बल प्रयोग से ही काबू किया जा सकता है। इसलिए उन पर बल प्रयोग करने में कोई संकोच नहीं किया जाना चाहिए। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय सम्पादक है)