Tuesday, April 12, 2011

पाकिस्तान का जिहादी मानस


भारतीयों के संदर्भ में शाहिद आफरीदी के बयान में जिहादी मानसिकता की झलक देख रहे हैं लेखक
पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान शाहिद आफरीदी भारतीयों के खिलाफ दिए अपने बयान से अब भले ही किनारा करना चाहें, किंतु वास्तविकता यही है कि उन्होंने उक्त बयान शमा समाचार चैनल के एक टॉक शो में दिया था और वह यह लाभ लेने की स्थिति में नहीं हैं कि उनके बयान को प्रिंट मीडिया ने तोड़मरोड़ कर पेश किया। उन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों के बारे में पूछने पर कहा था, मुसलमानों और पाकिस्तानियों की तरह हिंदुस्तानी बड़े दिलवाले नहीं हैं..हिंदुस्तानियों के साथ रहना या उनके साथ दीर्घकालीन रिश्ते बनाना हमारे लिए काफी मुश्किल चीज है। आफरीदी के इस बयान के बाद उक्त चैनल के स्टूडियों में मौजूद दर्शकों ने खूब तालियां बजाई थीं। आफरीदी अब यह कह रहे हैं कि उन्होंने तालिबान के डर से ऐसा कहा था। यदि ऐसा है तो पाकिस्तान में वास्तविक सत्ता किसके पास है? तालिबान के पास? तो क्रिकेट कूटनीति की आड़ में मित्रता का स्वांग रचने आए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को एक मुखौटा मात्र क्यों नहीं माना जाए? सच तो यही है कि पाकिस्तानी जनमानस में भारत विरोध की भावना गहरे पैबस्त है और क्रिकेट जैसे खेल में भी यह उन्माद साफ झलकता है। भारत के साथ खेल प्रतिस्पद्र्धा को पाकिस्तानी अवाम जंग की तरह लेता है और इसीलिए विश्व कप के सेमीफाइनल मैच में भारतीयों के हाथों मिली पराजय से आफरीदी घबराए हुए थे। आफरीदी ने उक्त बयान वस्तुत: कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए ही दिया था, किंतु उनके बयान की जब दुनिया भर में निंदा होने लगी तो उन्होंने पैंतरा बदल लिया। फिर भी इससे भारतीयों के प्रति पाकिस्तानियों के मन में बसी वितृष्णा कम नहीं हो जाती। विश्व कप फाइनल की जीत को भारतीय खिलाड़ी गौतम गंभीर ने मुंबई हमलों के पीडि़तों को समर्पित किया है। आफरीदी ने इसके लिए गंभीर की आलोचना कर उस मानसिकता की ही पुष्टि की है, जो भारत को हजार घाव देने के लिए प्रेरित करता है और ऐसे गाजियों को जन्नत में हूरें मिलने का सब्जबाग दिखाता है। आफरीदी ठीक कहते हैं। साठ सालों में दोनों देशों के बीच मित्रता कायम करने के न जाने कितने प्रयास हुए, किंतु परिणाम? वही ढाक के तीन पात। मित्रता कायम करने की कोशिशें परवान क्यों नहीं चढ़तीं? वह कौन सी मानसिकता है, जो भारत के साथ मित्रता कायम करने की विरोधी है और क्यों? क्यों भारत की कोख से ही पैदा हुआ पाकिस्तान भारतीय उप महाद्वीप की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति को नकारता है? सच्चाई यह है कि पाकिस्तान के बच्चों के दिमाग में भारत के प्रति घृणा और वैमनस्य के बीज बोए जा रहे हैं। पाकिस्तान के प्राथमिक विद्यालयों में इतिहास का जो पाठ्यक्रम है, उसमें पश्चिम के हाथों कथित इस्लाम की जलालत और हिंदुओं से साठगांठ कर ब्रितानियों द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े भाग को मुस्लिम राज से छीन लेने का उल्लेख है। यह बालपन से प्रतिशोध और घृणा का पाठ पढ़ाने के लिए काफी है। ऐसे माहौल में यदि मुंबई पर हमला करने वाले अजमल कसाब जैसे युवा पले-बढ़े हों तो उसमें आश्चर्य कैसा? पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों ने राज्य की नीतियों के साथ मजहब का बहुत गहरा संबंध विकसित किया है। युवाओं की एक बड़ी फौज ऐसी शिक्षण व्यवस्था (मदरसा व राज्य पोषित विद्यालय) में पल-बढ़ कर बड़ी होती है, जिसमें उनके मजहब को ही एकमात्र सच्चा पंथ बताया जाता है और दूसरे झूठे धमरें के अनुयायियों को हिंसा के बूते खदेड़ भगाना या उसे अपना मजहब अपनाने के लिए बाध्य कर देना सबसे बड़ा फर्ज बताया जाता है। इस्लामी मजहबी शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में भारत स्थित देवबंद स्कूल का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। 1857 की गदर के विफल हो जाने के बाद की परिस्थितियों में 1866 में नामचीन उलेमाओं द्वारा देवबंद स्कूल की स्थापना की गई थी। इस शिक्षण संस्थान की पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ब्रिटेन, दक्षिणी अफ्रीका सहित दुनिया भर में सैकड़ों शाखाएं हैं और मदरसों के मजहबी शिक्षण इसके दिशानिर्देशों पर ही संचालित होते हैं। देवबंद के पाठ्यक्रम में ये पंक्तियां उल्लिखित हैं, जब मुसलमान दुश्मन के देश में प्रवेश करते हैं और काफिरों व उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं तो उन्हें (बंधक काफिर) इस्लाम कबूल करने के लिए न्यौता देना अनिवार्य है। यदि वे इस्लाम कबूल कर लें तो जंग करना मुनासिब नहीं है, क्योंकि जंग लड़कर जो हासिल होना था, वह बिना लड़े ही प्राप्त हो गया। देवबंद के इस संदेश की अनदेखी कर क्या जिहाद को समझने का दावा किया जा सकता है? सच तो यह है कि मजहबी उन्माद की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा पाकिस्तान का जनमानस अपने आप को भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी आक्रांता के उत्तराधिकारी के रूप में देखता है। पाकिस्तान के डीएनए में ही मजहब पर आधारित उस सत्तातंत्र की स्थापना का संकल्प है, जो भारत की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति को नकारने और उसे तबाह करने के लिए प्रतिबद्ध है। पाकिस्तान के जन्म का मूल दर्शन उसे तालिबानीकरण की ओर निरंतर खींच रहा है। उसका अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान की संपूर्ण व्यवस्था का तालिबानीकरण करना है, जिसके लिए दुश्मन नंबर एक भारत सहित शेष दुनिया के साथ हिंसक जिहाद जायज है। पाकिस्तान की मानसिकता उसके द्वारा विकसित किए गए मिसाइलों के नामकरण में भी झलकती है। गजनी, गोरी, बाबर और अब्दाली पाक मिसाइलों के नाम हैं। ये वो नाम हैं, जिन्होंने भारत की कालजयी संस्कृति को अपमानित किया और उसके गौरव बिंदुओं को रौंदा। ऐसी मानसिकता के रहते मैत्री कैसे कायम हो सकती है? अगस्त, 1947 में भारत का रक्तरंजित बंटवारा हुआ और जन्म के दो माह के भीतर ही पाकिस्तान ने कबाइलियों की आड़ में कश्मीर पर हमला कर दिया। 1965 का भारत-पाक युद्ध क्यों हुआ? एक ओर वाजपेयी पाकिस्तान के साथ मैत्री कायम करने के लिए नवाज शरीफ के साथ वार्ता कर रहे थे तो दूसरी ओर कारगिल पर हमला किया गया। क्यों? भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वास कैसे कायम हो सकता है, जब पाकिस्तान भारत में कश्मीर और खालिस्तान के नाम पर निर्दोषों का रक्त बहाने के लिए निरंतर प्रयास करता रहे? पूर्वोत्तर के आतंकी गुटों को सैन्य और वित्तीय मदद दे? दोनों देशों के बीच मैत्री कायम करने के लिए चल रही वार्ता के बीच पाकिस्तानी हुक्मरानों के निर्देश पर मंबई पर हुआ आतंकी हमला पाकिस्तान की जिहादी मानसिकता को ही रेखांकित करता है, जिसे क्रिकेट कूटनीति से सुलझाने का स्वप्न हथेली पर सरसों उगाने के समान है। आफरीदी का बयान उसी कटु सत्य का प्रतिबिंब है। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)

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