जब से यूनाइटेड उल्फा के चेयरमैन तथा उसके कुछ शीर्ष नेताओं को बांग्लादेश द्वारा भारत को सौंपा गया है, तब से ही असम की तरुण गोगोई सरकार अरविंद रोजखोवा गुट के साथ समझौता करने के लिए बेचैन है। पिछले तीन दशकों से क्रांति के नाम पर असम के लोगों को आतंकित करने वाले संगठन के साथ शांति प्रक्रिया की शुरुआत में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो यह सोच अदूरदर्शी, अपने स्वार्थो को पूरा करने वाली और चुनावों को ध्यान में रखकर अपनाई गई लगती है। उल्फा के कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ जिसका संगठन के हथियारों और धन संसाधनों पर पूरा नियंत्रण है और जो इस शांति प्रक्रिया से बाहर है वह पूर्वी एशिया के एक प्रमुख हथियार सौदागार के रूप में उभरा है। संगठन के इस सबसे ताकतवर आदमी की भागीदारी के बिना उल्फा सरकार शांति प्रक्रिया का परिणाम 14 मार्च को असम ने देख लिया। गुवाहाटी-शिलांग रोड पर असम कांग्रेस मुख्यालय राजीव भवन में रोज की तरह गहमा-गहमी थी। तभी आइईडी धमाके ने इसके कार्यालय को हिलाकर रख दिया। इस हादसे में चार वरिष्ठ कांग्रेसी नेता घायल हो गए। सौभाग्य से विस्फोटक भवन की दीवार के बाहर रखा गया था। अगर यह कार्यालय के भीतर रखा गया होता तो परिणाम बहुत ही भयंकर हो सकते थे। धमाके के फौरन बाद उल्फा के परेश बरुआ धड़े ने हमले की जिम्मेदारी स्वीकार की। पहले बरुआ ने कांग्रेस को संगठन को विभाजित करने की उसकी गंभीर आपत्तियों के बावजूद शांति प्रक्रिया जारी रखने के लिए गंभीर परिणामों की चेतावनी दी थी। इस विस्फोट पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया वही पुरानी थी कि वह धमकियों के आगे नहीं झुकेगी और वह राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टी असम गण परिषद को परेश बरुआ की मदद से दिसपुर में सत्ता पर काबिज होने का सपना पूरा नहीं करने देगी। 1979 में उल्फा के जन्म के बाद आने वाली सरकारें भी लोगों को सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम रही हैं। इसलिए मुख्यमंत्री द्वारा राज्य के लोगों को साहस से धमकियों का सामना करने को कहने भर से काम नहीं चलेगा। उनकी सरकार को कुछ ऐसा करना होगा जिससे लोगों में भरोसा पैदा हो कि वह अपने घरों को सुरक्षित लौट सकते हैं। इसके लिए खुफिया और पुलिस तंत्र की मुस्तैदी जरूरी है। गोगोई सरकार उल्फा को बातचीत के लिए राजी करने का श्रेय लेना चाहती, जबकि संगठन का सैन्य प्रमुख अपने समर्थक सदस्यों के साथ शांति प्रक्रिया से बाहर है। विधानसभा चुनावों से पहले संदेश भेजा गया था कि अरविंद राजखोवा जैसे लोगों ने शांति प्रक्रिया के मामले में राज्य सरकार की गंभीरता और ईमानदारी के कारण ही दिलचस्पी दिखाई है, लेकिन परेश बरुआ की अनदेखी करने या उसका कद छोटा करने के परिणामों पर ध्यान नहीं दिया गया है। उल्फा के सबसे महत्वपूर्ण परेश बरुआ सहित सभी को शांति प्रक्रिया में शामिल करने के दीर्घ अवधि वाले परिणामों की बजाय तात्कालिक फायदों को ध्यान में रखकर गोगोई सरकार ने भारी भूल की है। उल्फा का कमांडर-इन-चीफ होने के नाते बरुआ अपने आतंक के राज को कायम रखने में सक्षम है। असम में बेरोजगारों की बढ़ती फौज को देखते हुए और इन लोगों के लिए उग्रवाद को किसी विचारधारा से प्रेरित आंदोलन न समझकर आतंकवाद के कारोबार में रोजगार के अवसरों के रूप में देखे जाने की वजह से बरुआ को जरूरत पड़ने पर अपने धड़े के लिए नौजवानों की भरती करने में कोई परेशानी नहीं होगी। उल्फा के संसाधनों पर अपने नियंत्रण के चलते वह एक नया आतंकी संगठन भी खड़ा कर सकता है। क्या कोई समझदार सरकार इन संभावनाओं से आंखें मूंद सकती है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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