मणिपुर में सेना की प्रेरणास्पद पहल पर लेखक की टिप्पणी
मणिपुर के कुछ हिस्सों में एक अलग तरह की ही क्रांति चल रही है। इतने सालों से सेना और अर्द्धसैनिक बल स्थानीय लोगों से बंदूक से निपटते रहे हैं, लेकिन अब वे उन लोगों से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं, जो लड़ाई छोड़ना चाहते हैं। बेंगलूर के एक आध्यात्मिक संगठन, आर्ट आफ लिविंग फाउंडेशन द्वारा चलाए गए गहन आध्यात्मिक तथा व्यावसायिक ट्रेनिंग कार्यक्रम के जरिए पिछले साल आत्म-समर्पण करने वाले 172 से अधिक उग्रवादियों का पुनर्वास किया जा चुका है। कुछ लोग इस रणनीति की आलोचना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सेना को शांति की राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन सशस्त्र सेनाओं को यकीन है कि शांति का यही रास्ता है। उग्रवादियों के परिवारों को संकेत भेजे जा रहे हैं और बंदूक छोड़ने के बदले आकर्षक पुनर्वास पैकेज का वायदा किया जा रहा है। लगता है, संदेश काम कर रहे हैं। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार अगले कुछ महीनों में कुछ और उग्रवादी समर्पण करने जा रहे हैं। उग्रवाद का सामना करने के साथ-साथ सेना द्वारा लोगों के दिलोदिमाग जीतने के लिए चलाई गई कई परियोजनाओं में से एक ध्यान शिविर परियोजना भी है। इसके अलावा दूर-दराज के पर्वतीय इलाकों में चिकित्सा शिविर लगाए जा रहे हैं, शुष्क इलाकों में जलापूर्ति करने, बारूदी सुरंगों के शिकार लोगों को कृत्रिम अंग प्रदान किए जा रहे हैं और पुल बनाए जा रहे हैं। गांवों में फुटबाल के मैदान और स्कूल फिर शुरू किए गए हैं। गांधीगीरी का एक नया रूप देखने में आ रहा है। असम राइफल्स की ऑपरेशन गुड समारिटन रणनीति के तहत सामाजिक प्रयासों के माध्यम से जवान लोगों तक पहुंच रहे हैं। असम राइफल्स के महानिदेशक, लेफ्टिनेंट जनरल रामेश्वर राय कहते हैं, यह मानवीय चेहरे वाला उग्रवाद विरोधी अभियान है। अगर आम आदमी को सेनाओं या सरकार पर भरोसा नहीं है, तो आप उग्रवादियों से कैसे लड़ सकते हैं।सुरक्षा बलों का पहला काम लोगों को जमीनी हकीकतों से रू-ब-रू कराना और उन्हें जबरन वसूली के खिलाफ खड़ा होने में मदद करना था। इसके लिए आतंकवादियों और उनके परिवारों से भावात्मक अपीलें की जा रही हैं। इनका मकसद ऐसे नेतृत्व को अलग-थलग करना और सरकार में लोगों का विश्वास जगाना है। लगता है कि कुछ इलाकों में छवि निर्माण के सुपरिणाम निकले हैं। दक्षिणी मणिपुर में साजिक घाटी का गांवा साजिक ताम्पाक इसका एक उदाहरण है। असम राइफल्स की 8वीं बटालियन के कमांडिंग ऑफीसर कर्नल रविंदर कुमार कहते हैं, पांच साल पहले तक यह गांव विद्रोहियों का गढ़ हुआ करता था। लेकिन अब यह शांति और विकास का एक मॉडल है। पांच साल पहले उग्रवादियों को सीमापार म्यांमार में खदेड़े जाने से पहले असम राइफल्स की बैरकें उग्रवादियों की शिविर हुआ करती थीं। अब इस बटालियन में एक प्राथमिक स्वास्थ्य उप-केंद्र और एक सरकारी हाई स्कूल हैं। इनके अलावा नौजवानों के लिए नौकरियों की व्यवस्था की गई है और सौर-ऊर्जा स्थापित की गई है। अफीम की खेती इस इलाके की सबसे बड़ी समस्या थी। उग्रवादी अफीम की म्यांमार में तस्करी करते थे। सेना ने करोड़ों रुपये की अफीम की फसल काट कर जला डाली और इंफाल के केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को बुलाकर स्थानीय लोगों को शिक्षित किया। उन्हें अदरक, फलों तथा अन्य नकद फसलों के बीज व पौध दीं और इनकी खेती के लिए प्रोत्साहित किया। विकास योजनाओं के जरिए सेना ने लोगों के लिए अवसर उत्पन्न किए। इलाके में निजी वाहनों की बढ़ती संख्या से यहां की समृद्धि का अंदाजा लगाया जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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