Saturday, April 30, 2011
Thursday, April 28, 2011
अल कायदा ने कई देशों की मस्जिदों को बनाया भर्ती केंद्र
आतंकवादी संगठन अल कायदा ने दुनिया भर की मस्जिदों और इस्लामिक केंद्रों का इस्तेमाल आतंकियों को भर्ती करने और प्रशिक्षण देने में किया है। इनमें लंदन, कराची और यमन की मस्जिदें भी शामिल हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन से हासिल की सूची के हवाले यह दावा किया है। पेंटागन ने क्यूबा स्थित गुआंतानामो जेल के कैदियों से पूछताछ के आधार पर यह सूची तैयार की थी। इनमें मॉन्टि्रयल की अल-सुन्ना मस्जिद, कराची स्थित अबू बक्र अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, यमन के सादाह स्थित दिमाज संस्थान और काबुल की वजीर अकबर खान मस्जिद शामिल हैं। साथ ही गैर इस्लामी देश ब्रिटेन में उत्तरी लंदन की फिन्सबरी पार्क मस्जिद, इटली के मिलान स्थित इस्लामी सांस्कृतिक संस्थान की मस्जिद, फ्रांस के लेयॉन स्थित लैनेक मस्जिद भी है। लेयॉन की मस्जिद के प्रमुख कामेल काबताने ने इस मस्जिद का नाम सूची में आने पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए इसे हास्यास्पद करार दिया है। उन्होंने फ्रांस में अमेरिकी राजदूत से मिल कर इस मामले पर अपना विरोध दर्ज कराने की बात कही है। पेंटागन के एक अन्य दस्तावेज में अमेरिकी नौसेना के हिरासत केंद्र में बंद मॉरीतानिया के 40 वर्षीय मोहमेदोऊ सलाही का नाम भी है जो 1999 से 2000 के दौरान मॉन्टि्रयल मस्जिद में इमाम था। दस्तावेज में सलाही को जर्मनी में प्रशिक्षित एक इलेक्टि्रकल इंजीनियर बताया गया है जो अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन के संपर्क में आया। बाद में उसने चार आतंकियों की भर्ती की जो 9/11 अमेरिकी हमले में शामिल थे। इनमें से तीन पायलट थे जिन्होंने विमानों को ट्विन टॉवर्स से टकराकर हमला किया। बच सकती थी डेनियल पर्ल की जान : विकिलीक्स बोस्टन, पे्रट्र : फरवरी 2002 में अपहरण के बाद मारे गए अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की जान बच सकती थी। विकिलीक्स के दस्तावेजों में यह बात कही गई है। वॉल स्ट्रीट जर्नल के 38 वर्षीय पत्रकार पर्ल की हत्या अल कायदा आतंकी खालिद मोहम्मद शेख ने की थी। लॉस एंजेलिस टाइम ने विकिलीक्स हवाले से कहा,अल कायदा के बड़े मिलिट्री कमांडर सैफुल अदल ने खालिद को पर्ल की हत्या करने से सख्ती से मना किया था। खालिद ने इस काम के लिए शरीफ अल मसरी की मदद से अल कायदा के वित्त प्रमुख सउद मेमन के पाकिस्तान स्थित आवास पर पर्ल की हत्या कर दी|
Wednesday, April 27, 2011
26/11 : पाक अधिकारी-आतंकियों पर आरोप तय
मंुबई हमलों के मामले में शक की सूई बार-बार पाकिस्तान की ओर ही घूमती है। फिर चाहे ये हमले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने कराए हों या उसके द्वारा पाले जा रहे आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने। ताजा घटनाक्रम में अमेरिकी अभियोजकों ने इस मामले में लश्कर के चार आतंकियों को आरोपी बनाया है। सोमवार को अदालत में दाखिल आरोप-पत्र के मुताबिक, चार पाकिस्तानी नागरिक साजिद मीर, मजहर इकबाल, अबू कहाफा और मेजर इकबाल भी इस साजिश में शामिल हैं। मेजर इकबाल पाकिस्तानी सेना का अधिकारी है। उल्लेखनीय है कि 25 फरवरी, 2010 को दिल्ली में हुई भारत-पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की बैठक में भारत द्वारा पाकिस्तान को सौंपे गए एक दस्तावेज में मेजर इकबाल और एक अन्य मेजर समीर अली का भी नाम था। अमेरिकी अभियोजकों ने इन चारों के अलावा लश्कर सदस्य डी नाम से एक व्यक्ति को भी आरोपी बनाया गया है। हेडली के सहयोगी की भूमिका निभाने वाला साजिद मीर लश्कर से जुड़ा था और वह अन्य आतंकी संगठनों के साथ संबंधों की निगरानी करता था। अबू कहाफा आतंकवादियों को हमलों के लिए आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण देता था। मजहर इकबाल और लश्कर सदस्य डी लश्कर के कमांडर हैं। जबकि मेजर इकबाल पर हमलों की योजना बनाने और वित्तीय मदद देने का आरोप है। अभियोजकों के मुताबिक, शिकागो की एक जेल में बंद हेडली ने लश्कर के शिविर में प्रशिक्षण लिया था। इस दौरान उसने लश्कर के सरगनाओं के साथ मिलकर आतंकवादी हमलों की साजिश रची थी। हेडली व राणा के मामले की सुनवाई 16 मई को है।
Thursday, April 21, 2011
खुदा हाफिज पाकिस्तान!
पाकिस्तान में कट्टरपंथी व आतंकी तत्वों को सरकार और समाज पर हावी होते देख रहे हैं लेखक
ब्रिटिश पत्रकार जॉर्ज फुल्टन ने पाकिस्तान छोड़ने का फैसला कर लिया है। देश के प्रति बेपनाह मोहब्बत के प्रतीक के तौर पर मुशर्रफ कार्यकाल में उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता प्रदान की गई थी। पाकिस्तानी अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून में उन्होंने लिखा कि उन्होंने पाकिस्तान में जो कुछ देखा है, इसके बाद वहां रहना संभव नहीं रह गया है। पाकिस्तान को खुदा हाफिज करने के उनके फैसले का उनकी पाकिस्तानी सास ने भी समर्थन किया है। अपने लेख में उन्होंने कहा है कि जिस देश से उन्होंने मोहब्बत की, उसने उन्हें मायूस किया है। उन्होंने लेख की शुरुआत में लिखा है, पाकिस्तान विश्व के सर्वाधिक हिंसक देशों में से एक है। विभाजन पूर्व के भारतीय मुसलमानों को सुरक्षित पनाह देने के लिए बने इस देश के मुसलमानों के एक वर्ग ने आजादी (बांग्लादेश) के लिए संघर्ष किया। गवर्नर सलमान तसीर की उनके गार्डो द्वारा हत्या के साथ ही पाकिस्तान में उम्मीद की भी हत्या हो गई। तसीर की हत्या पाकिस्तानी मानसिकता की प्रतीक है। पाकिस्तानी समाज के तमाम तबकों और सामाजिक-आर्थिक समूहों में उग्रवाद ने पैठ जमा ली है। ये लोग हर बुराई के लिए हिंदुओं, यहूदियों और अमेरिकियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके अनुसार, हाल ही में पाकिस्तानी गायक राहत अली खान की दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हिरासत पाकिस्तान के पाक नाम को बदनाम करने की दुष्ट हिंदुओं की साजिश है। राहत अली द्वारा गैरकानूनी ढंग से मुद्रा लाना और राहत का यह बयान भी उनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है कि हिरासत में उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया गया और वह आगे भी भारत में संगीत कार्यक्रमों में हिस्सा लेते रहेंगे। फुल्टन के अनुसार पाकिस्तान में जिहादी शक्तियों और कट्टर मुस्लिमों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करने के लिए औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। उनका मानना है कि आस्था और राष्ट्र की रक्षक पाकिस्तानी सेना उत्प्रेरक के तौर पर काम कर रही है। 1998 में परमाणु क्लब में शामिल होने के बाद पाक सेना की दबंगई बढ़ गई है। इसके बाद ही कारगिल में दुस्साहस, भारतीय संसद पर आतंकी हमला और भारत की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में आतंकी नरसंहार हुआ है। यह जगजाहिर है कि पाकिस्तान के संभावित विनाश का प्रमुख कारण पाक सेना है। पाकिस्तान के प्रति नरम रुख रखने वाले ब्रिटिश पत्रकार फुल्टन का कहना है कि अमेरिका परस्ती के विरोध का रोना रोने के बावजूद पाकिस्तान अमेरिकावाद की स्थायी दासता के गंभीर रोग से ग्रस्त है। यह अमेरिका के पिट्ठू राष्ट्र के रूप में रहकर खुश है। जो फुल्टन नहीं कहते वह जानने के लिए हमें माग्ररेट बुर्क व्हाइट की पुस्तक हाफवे टु फ्रीडम पढ़नी होगी। इस किताब में लिखा है कि पाकिस्तान में इस्लाम प्रभुत्व और अमेरिकापरस्ती के बीज तभी पड़ गए थे, जब कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने तीहरा ताज पहना था। वह नए राष्ट्र के गवर्नर जनरल, उस समय पाकिस्तान की एकमात्र राजनीतिक पार्टी मुस्लिम लीग के अध्यक्ष और देश के कानून का निर्माण करने वाली इकाई कंस्टीट्यूशन एसेंबली के अध्यक्ष थे। माग्ररेट की पुस्तक में अतीत की अंतदृष्टि और भविष्य के सबक मिलते हैं। जहां तक फुल्टन का संबंध है वह अपने निष्कर्षो को सही ठहराते हैं कि अमेरिका के खिलाफ पाकिस्तान कितना ही हल्ला मचाए, किंतु हर बार उसकी गुर्राहट मिमियाहट में बदल जाती है। इसकी पुष्टि रेमंड डेविस मामले से हो जाती है। पहले सरकार और पाकिस्तान के सभी वर्गो ने रेमंड को मौत की सजा देने की मांग की और बाद में उसे चुपचाप रिहा कर दिया। रेमंड डेविस मामले से पता चलता है कि पाकिस्तान अमेरिका के साथ खेल खेलने में कामयाब नहीं हो रहा है। पाश्चात्य मूल्यों, जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन का सम्मान और आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की इच्छाशक्ति के अभाव का खुलासा हो रहा है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को संक्षिप्त बजट के लिए मजबूर किया था। बजट में पाकिस्तान ने खर्च में 173 अरब रुपये की कटौती की और 53 अरब रुपये के नए कर लगाए। व्हाइट हाउस को मालूम है कि पाकिस्तान में अमेरिका विरोध भावनाएं भड़कने पर उसके लिए संसद से घातक हथियारों और सैन्य साजोसामान की पाकिस्तान को आपूर्ति और पाकिस्तानियों को उदारता से वीजा जारी करने की अनुमति हासिल करना कठिन हो जाएगा। जॉर्ज फुल्टन के खुदा हाफिज पाकिस्तान लेख पर विश्व का ध्यान जाने के बाद दुनिया भर में पाकिस्तान की तीखी आलोचना हो रही है। यह पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी है। गहरी नींद से जागने के बाद अब पश्चिम को आभास हो रहा है कि पाकिस्तान उग्रवाद और असहिष्णुता के मार्ग पर बढ़ रहा है। पाकिस्तान ईसाई और अन्य धर्मो में यकीन रखने वालों की जरा भी परवाह नहीं करता। वहां पाठ्यपुस्तकों, प्रवचनों और मीडिया के माध्यम से अन्य धर्मो के प्रति विद्वेष फैलाया जा रहा है। पाकिस्तान का निर्माण एक ऐसे पंथ में आस्था रखने वालों के लिए हुआ है, जो सहिष्णुता और आपसी भाइचारे का पाठ पढ़ाता है। किंतु जैसाकि मेडिकल छात्र आसिफ नवाज ने कहा है कि आज पाकिस्तान में पाखंड और ताकत का वर्चस्व है। जैसे ही लोग सुनते हैं कि अमेरिका में कुरान को लेकर अशोभनीय घटना हुई है या कोई अशोभनीय कार्टून किसी ऐसे अखबार में छपा है, जिसे उन्होंने पढ़ा ही नहीं है, वैसे ही वे सड़कों पर तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं। फ्रांस में बुर्का पर प्रतिबंध लगाने के विरोध में कानफोड़ू नारेबाजी शुरू हो जाती है। उनका मानना है कि अन्य लोग उनकी आस्था पर आघात कर रहे हैं। इसमें हैरत की बात नहीं है कि पाकिस्तान में उदारवादी लोग भी चुप्पी साधना ही बेहतर समझते हैं। वे कुछ भी बोलने से कतराते हैं क्योंकि उग्रवादी और कट्टरपंथी देश में उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं देता। इससे पाकिस्तान में उदार परंपरा की कमजोर धारा का संकेत मिलता है। बीबीसी के सर्वे से हैरत नहीं होती, जिसमें पाकिस्तान को सबसे नकारात्मक देशों की सूची में उत्तर कोरिया और ईरान की कतार में रखा गया है। फुल्टन के विस्फोट और कट्टरपंथी व उग्रवादी शक्तियों के इस्लामाबाद व रावलपिंडी में अपने मुख्तारों को बेदखल कर सत्ता हथियाने के प्रयासों ने सर्वे के आलोचकों के मुंह बंद कर दिए हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Wednesday, April 20, 2011
Sunday, April 17, 2011
असम में शांति की उम्मीद
जब से यूनाइटेड उल्फा के चेयरमैन तथा उसके कुछ शीर्ष नेताओं को बांग्लादेश द्वारा भारत को सौंपा गया है, तब से ही असम की तरुण गोगोई सरकार अरविंद रोजखोवा गुट के साथ समझौता करने के लिए बेचैन है। पिछले तीन दशकों से क्रांति के नाम पर असम के लोगों को आतंकित करने वाले संगठन के साथ शांति प्रक्रिया की शुरुआत में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो यह सोच अदूरदर्शी, अपने स्वार्थो को पूरा करने वाली और चुनावों को ध्यान में रखकर अपनाई गई लगती है। उल्फा के कमांडर-इन-चीफ परेश बरुआ जिसका संगठन के हथियारों और धन संसाधनों पर पूरा नियंत्रण है और जो इस शांति प्रक्रिया से बाहर है वह पूर्वी एशिया के एक प्रमुख हथियार सौदागार के रूप में उभरा है। संगठन के इस सबसे ताकतवर आदमी की भागीदारी के बिना उल्फा सरकार शांति प्रक्रिया का परिणाम 14 मार्च को असम ने देख लिया। गुवाहाटी-शिलांग रोड पर असम कांग्रेस मुख्यालय राजीव भवन में रोज की तरह गहमा-गहमी थी। तभी आइईडी धमाके ने इसके कार्यालय को हिलाकर रख दिया। इस हादसे में चार वरिष्ठ कांग्रेसी नेता घायल हो गए। सौभाग्य से विस्फोटक भवन की दीवार के बाहर रखा गया था। अगर यह कार्यालय के भीतर रखा गया होता तो परिणाम बहुत ही भयंकर हो सकते थे। धमाके के फौरन बाद उल्फा के परेश बरुआ धड़े ने हमले की जिम्मेदारी स्वीकार की। पहले बरुआ ने कांग्रेस को संगठन को विभाजित करने की उसकी गंभीर आपत्तियों के बावजूद शांति प्रक्रिया जारी रखने के लिए गंभीर परिणामों की चेतावनी दी थी। इस विस्फोट पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया वही पुरानी थी कि वह धमकियों के आगे नहीं झुकेगी और वह राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टी असम गण परिषद को परेश बरुआ की मदद से दिसपुर में सत्ता पर काबिज होने का सपना पूरा नहीं करने देगी। 1979 में उल्फा के जन्म के बाद आने वाली सरकारें भी लोगों को सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम रही हैं। इसलिए मुख्यमंत्री द्वारा राज्य के लोगों को साहस से धमकियों का सामना करने को कहने भर से काम नहीं चलेगा। उनकी सरकार को कुछ ऐसा करना होगा जिससे लोगों में भरोसा पैदा हो कि वह अपने घरों को सुरक्षित लौट सकते हैं। इसके लिए खुफिया और पुलिस तंत्र की मुस्तैदी जरूरी है। गोगोई सरकार उल्फा को बातचीत के लिए राजी करने का श्रेय लेना चाहती, जबकि संगठन का सैन्य प्रमुख अपने समर्थक सदस्यों के साथ शांति प्रक्रिया से बाहर है। विधानसभा चुनावों से पहले संदेश भेजा गया था कि अरविंद राजखोवा जैसे लोगों ने शांति प्रक्रिया के मामले में राज्य सरकार की गंभीरता और ईमानदारी के कारण ही दिलचस्पी दिखाई है, लेकिन परेश बरुआ की अनदेखी करने या उसका कद छोटा करने के परिणामों पर ध्यान नहीं दिया गया है। उल्फा के सबसे महत्वपूर्ण परेश बरुआ सहित सभी को शांति प्रक्रिया में शामिल करने के दीर्घ अवधि वाले परिणामों की बजाय तात्कालिक फायदों को ध्यान में रखकर गोगोई सरकार ने भारी भूल की है। उल्फा का कमांडर-इन-चीफ होने के नाते बरुआ अपने आतंक के राज को कायम रखने में सक्षम है। असम में बेरोजगारों की बढ़ती फौज को देखते हुए और इन लोगों के लिए उग्रवाद को किसी विचारधारा से प्रेरित आंदोलन न समझकर आतंकवाद के कारोबार में रोजगार के अवसरों के रूप में देखे जाने की वजह से बरुआ को जरूरत पड़ने पर अपने धड़े के लिए नौजवानों की भरती करने में कोई परेशानी नहीं होगी। उल्फा के संसाधनों पर अपने नियंत्रण के चलते वह एक नया आतंकी संगठन भी खड़ा कर सकता है। क्या कोई समझदार सरकार इन संभावनाओं से आंखें मूंद सकती है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Thursday, April 14, 2011
फिर पाक के मुंह पर धूल
मुंबई हमले की साजिश में पाकिस्तान सरकार, उसकी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई का सीधा हाथ था। भारत यह बात शुरू से कह रहा था लेकिन दुनिया की नजर में अब तक यह आरोप भर था। अब इस बात की पुष्टि वही कर रहे हैं जिन्होंने इस साजिश को अमलीजामा पहनाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। अमेरिका की जेल में बंद डेविड हेडली और तसव्वुर राणा ने अदालत के सामने बयान दिया है कि उन्होंने जो कुछ किया वह पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के कहने पर किया और आतंकी गिरोह लश्करे तैयबा से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। यह बयान ऐसे मौके पर आया है जब अमेरिकी अदालत में इनके मामले की सुनवाई शुरू होनी है। हेडली की यह स्वीकारोक्ति इसलिए नहीं है कि उसका दिल बदल गया है या उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा हो। उसने यह कलाबाजी अपने बचाव में लगाई है। वह बताना चाह रहा है कि मुंबई हमले से जुड़ी तमाम कारगुजारी उसने पाकिस्तान सरकार के कहने पर की थी इसलिए सजा का हकदार नहीं है। अब अमेरिकी अदालत इस रहस्योद्घाटन पर क्या रुख अपनाती है यह तो देखने की बात होगी लेकिन पाकिस्तान का आतंकी चेहरा एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब तो हो ही गया है। पाकिस्तान अब तक दुनिया को यही समझा रहा था कि भारत के खिलाफ आतंकी हमलों के पीछे लश्करे तैयबा जैसे आतंकी गिरोह हैं जो कश्मीर को लेकर खफा हैं और सरकार कभी भी ऐसी साजिशों का हिस्सा नहीं रहती है। हेडली और राणा के बयानों के बाद पाकिस्तान कैसे मुंह छिपाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। ये बयान ऐसे वक्त पर आए जिस समय आईएसआई का चीफ शुजा पाशा नई चिरौरियां करने अमेरिका गया हुआ था। बयान के बाहर आते ही वह अमेरिका दौरा बीच में ही छोड़ कर पाकिस्तान भाग गया। लेकिन सिर्फ हेडली या राणा ही नहीं हैं जो पाकिस्तान के पापों का घड़ा फोड़ रहे हों। दक्षिण अमेरिकी देश चिली में भी रऊफ नाम का पाकिस्तानी पकड़ा गया है जिस पर भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार ले जाने और फिरौती के रूप में कुख्यात आतंकी मौलाना मसूद अजहर को छुड़वाने का आरोप है। इस कांड में भी आईएसआई की मुख्य भूमिका रही है और इसके ढ़ेर सारे सबूत भी मिले हैं। साजिश रचने से लेकर अपहर्ताओं को तमाम मदद उपलब्ध कराने में इस खुफिया एजेंसी की भूमिका की पुष्टि खुद अफगानिस्तान के तालिबानी विदेश मंत्री मुल्ला वकील अहमद मुत्तवाकिल ने की थी। अफगानिस्तान से तालिबानी सत्ता के सफाए के बाद मुत्तवाकिल वहां नई सरकार की हिरासत में था, जब भारत से सीबीआई टीम उससे पूछताछ करने गई थी। अब अगर चिली में पकड़ा गया रऊफ विमान अपहर्ताओं में से निकला तो पाकिस्तान के मुंह पर एक बार फिर धूल पड़नी तय है। अब समझा जा सकता है कि मुंबई हमले के आरोप में पाकिस्तान में पकड़े गए लोगों पर क्यों कार्रवाई नहीं हो रही है और उन लोगों की आवाजों का नमूना बार-बार मांगने के बावजूद क्यों भारत को उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है? अगर गर्दन फंसी तो वे लोग भी हेडली और राणा की तरह मुंह खोलना शुरू कर देंगे। शायद यही कारण है कि पाकिस्तान ने अब आतंकी गिरोहों के अलावा चीन का नया कार्ड भारत के विरोध में खेलना शुरू कर दिया है। चीन को वह अपने कब्जे वाला कश्मीर प्लेट में सजा कर भेंट कर रहा है। पाकिस्तान को लग रहा होगा कि अधिकृत कश्मीर में चीनी सेना को देखते ही भारत के होश उड़ जाएंगे। लेकिन अभी तो खुद उसे अपने होश काबू में रखने की जरूरत है।
Tuesday, April 12, 2011
पाकिस्तान का जिहादी मानस
भारतीयों के संदर्भ में शाहिद आफरीदी के बयान में जिहादी मानसिकता की झलक देख रहे हैं लेखक
पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान शाहिद आफरीदी भारतीयों के खिलाफ दिए अपने बयान से अब भले ही किनारा करना चाहें, किंतु वास्तविकता यही है कि उन्होंने उक्त बयान शमा समाचार चैनल के एक टॉक शो में दिया था और वह यह लाभ लेने की स्थिति में नहीं हैं कि उनके बयान को प्रिंट मीडिया ने तोड़मरोड़ कर पेश किया। उन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों के बारे में पूछने पर कहा था, मुसलमानों और पाकिस्तानियों की तरह हिंदुस्तानी बड़े दिलवाले नहीं हैं..हिंदुस्तानियों के साथ रहना या उनके साथ दीर्घकालीन रिश्ते बनाना हमारे लिए काफी मुश्किल चीज है। आफरीदी के इस बयान के बाद उक्त चैनल के स्टूडियों में मौजूद दर्शकों ने खूब तालियां बजाई थीं। आफरीदी अब यह कह रहे हैं कि उन्होंने तालिबान के डर से ऐसा कहा था। यदि ऐसा है तो पाकिस्तान में वास्तविक सत्ता किसके पास है? तालिबान के पास? तो क्रिकेट कूटनीति की आड़ में मित्रता का स्वांग रचने आए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को एक मुखौटा मात्र क्यों नहीं माना जाए? सच तो यही है कि पाकिस्तानी जनमानस में भारत विरोध की भावना गहरे पैबस्त है और क्रिकेट जैसे खेल में भी यह उन्माद साफ झलकता है। भारत के साथ खेल प्रतिस्पद्र्धा को पाकिस्तानी अवाम जंग की तरह लेता है और इसीलिए विश्व कप के सेमीफाइनल मैच में भारतीयों के हाथों मिली पराजय से आफरीदी घबराए हुए थे। आफरीदी ने उक्त बयान वस्तुत: कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए ही दिया था, किंतु उनके बयान की जब दुनिया भर में निंदा होने लगी तो उन्होंने पैंतरा बदल लिया। फिर भी इससे भारतीयों के प्रति पाकिस्तानियों के मन में बसी वितृष्णा कम नहीं हो जाती। विश्व कप फाइनल की जीत को भारतीय खिलाड़ी गौतम गंभीर ने मुंबई हमलों के पीडि़तों को समर्पित किया है। आफरीदी ने इसके लिए गंभीर की आलोचना कर उस मानसिकता की ही पुष्टि की है, जो भारत को हजार घाव देने के लिए प्रेरित करता है और ऐसे गाजियों को जन्नत में हूरें मिलने का सब्जबाग दिखाता है। आफरीदी ठीक कहते हैं। साठ सालों में दोनों देशों के बीच मित्रता कायम करने के न जाने कितने प्रयास हुए, किंतु परिणाम? वही ढाक के तीन पात। मित्रता कायम करने की कोशिशें परवान क्यों नहीं चढ़तीं? वह कौन सी मानसिकता है, जो भारत के साथ मित्रता कायम करने की विरोधी है और क्यों? क्यों भारत की कोख से ही पैदा हुआ पाकिस्तान भारतीय उप महाद्वीप की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति को नकारता है? सच्चाई यह है कि पाकिस्तान के बच्चों के दिमाग में भारत के प्रति घृणा और वैमनस्य के बीज बोए जा रहे हैं। पाकिस्तान के प्राथमिक विद्यालयों में इतिहास का जो पाठ्यक्रम है, उसमें पश्चिम के हाथों कथित इस्लाम की जलालत और हिंदुओं से साठगांठ कर ब्रितानियों द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े भाग को मुस्लिम राज से छीन लेने का उल्लेख है। यह बालपन से प्रतिशोध और घृणा का पाठ पढ़ाने के लिए काफी है। ऐसे माहौल में यदि मुंबई पर हमला करने वाले अजमल कसाब जैसे युवा पले-बढ़े हों तो उसमें आश्चर्य कैसा? पाकिस्तान के सैन्य तानाशाहों ने राज्य की नीतियों के साथ मजहब का बहुत गहरा संबंध विकसित किया है। युवाओं की एक बड़ी फौज ऐसी शिक्षण व्यवस्था (मदरसा व राज्य पोषित विद्यालय) में पल-बढ़ कर बड़ी होती है, जिसमें उनके मजहब को ही एकमात्र सच्चा पंथ बताया जाता है और दूसरे झूठे धमरें के अनुयायियों को हिंसा के बूते खदेड़ भगाना या उसे अपना मजहब अपनाने के लिए बाध्य कर देना सबसे बड़ा फर्ज बताया जाता है। इस्लामी मजहबी शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में भारत स्थित देवबंद स्कूल का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। 1857 की गदर के विफल हो जाने के बाद की परिस्थितियों में 1866 में नामचीन उलेमाओं द्वारा देवबंद स्कूल की स्थापना की गई थी। इस शिक्षण संस्थान की पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ब्रिटेन, दक्षिणी अफ्रीका सहित दुनिया भर में सैकड़ों शाखाएं हैं और मदरसों के मजहबी शिक्षण इसके दिशानिर्देशों पर ही संचालित होते हैं। देवबंद के पाठ्यक्रम में ये पंक्तियां उल्लिखित हैं, जब मुसलमान दुश्मन के देश में प्रवेश करते हैं और काफिरों व उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं तो उन्हें (बंधक काफिर) इस्लाम कबूल करने के लिए न्यौता देना अनिवार्य है। यदि वे इस्लाम कबूल कर लें तो जंग करना मुनासिब नहीं है, क्योंकि जंग लड़कर जो हासिल होना था, वह बिना लड़े ही प्राप्त हो गया। देवबंद के इस संदेश की अनदेखी कर क्या जिहाद को समझने का दावा किया जा सकता है? सच तो यह है कि मजहबी उन्माद की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा पाकिस्तान का जनमानस अपने आप को भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी आक्रांता के उत्तराधिकारी के रूप में देखता है। पाकिस्तान के डीएनए में ही मजहब पर आधारित उस सत्तातंत्र की स्थापना का संकल्प है, जो भारत की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति को नकारने और उसे तबाह करने के लिए प्रतिबद्ध है। पाकिस्तान के जन्म का मूल दर्शन उसे तालिबानीकरण की ओर निरंतर खींच रहा है। उसका अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान की संपूर्ण व्यवस्था का तालिबानीकरण करना है, जिसके लिए दुश्मन नंबर एक भारत सहित शेष दुनिया के साथ हिंसक जिहाद जायज है। पाकिस्तान की मानसिकता उसके द्वारा विकसित किए गए मिसाइलों के नामकरण में भी झलकती है। गजनी, गोरी, बाबर और अब्दाली पाक मिसाइलों के नाम हैं। ये वो नाम हैं, जिन्होंने भारत की कालजयी संस्कृति को अपमानित किया और उसके गौरव बिंदुओं को रौंदा। ऐसी मानसिकता के रहते मैत्री कैसे कायम हो सकती है? अगस्त, 1947 में भारत का रक्तरंजित बंटवारा हुआ और जन्म के दो माह के भीतर ही पाकिस्तान ने कबाइलियों की आड़ में कश्मीर पर हमला कर दिया। 1965 का भारत-पाक युद्ध क्यों हुआ? एक ओर वाजपेयी पाकिस्तान के साथ मैत्री कायम करने के लिए नवाज शरीफ के साथ वार्ता कर रहे थे तो दूसरी ओर कारगिल पर हमला किया गया। क्यों? भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वास कैसे कायम हो सकता है, जब पाकिस्तान भारत में कश्मीर और खालिस्तान के नाम पर निर्दोषों का रक्त बहाने के लिए निरंतर प्रयास करता रहे? पूर्वोत्तर के आतंकी गुटों को सैन्य और वित्तीय मदद दे? दोनों देशों के बीच मैत्री कायम करने के लिए चल रही वार्ता के बीच पाकिस्तानी हुक्मरानों के निर्देश पर मंबई पर हुआ आतंकी हमला पाकिस्तान की जिहादी मानसिकता को ही रेखांकित करता है, जिसे क्रिकेट कूटनीति से सुलझाने का स्वप्न हथेली पर सरसों उगाने के समान है। आफरीदी का बयान उसी कटु सत्य का प्रतिबिंब है। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं)
कंधार कांड का आरोपी चिली में गिरफ्तार
इंडियन एयरलाइंस के विमान आइसी-814 के अपहरण के 12 साल बाद उसके एक आरोपी अब्दुल रऊफ को चिली में इंटरपोल ने गिरफ्तार कर लिया है। रऊफ की गिरफ्तारी की सूचना भारतीय एजेंसियों को दे दी गई है। लेकिन इस मामले की जांच करने वाली सीबीआइ यह सुनिश्चित नहीं कर पा रही है कि गिरफ्तार अब्दुल रऊफ आइसी-814 के अपहरण का आरोपी ही है या कोई दूसरा है। जांच से जुड़े सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि चिली से अब तक सिर्फ अब्दुल रऊफ नाम के किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की सूचना मिली है, लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि गिरफ्तार व्यक्ति विमान अपहरण का आरोपी है या नहीं। उन्होंने कहा कि इंटरपोल के रेड कार्नर नोटिस में सिर्फ रऊफ अब्दुल उर्फ अब्दुल रऊफ अलवी, जन्म स्थान बहावलपुर पाकिस्तान और जन्म की तारीख में 1974 लिखा हुआ है। इसके अलावा न तो उसका फोटो है और न ही बालों व आंखों का रंग या फिर कोई अन्य विशिष्ट पहचान चिन्ह जिसके आधार पर गिरफ्तार अब्दुल रऊफ का आरोपी अब्दुल रऊफ से मिलान किया जा सके। उन्होंने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति की पहचान के लिए जल्द जांच से जुड़े सीबीआइ अधिकारियों की टीम चिली जा सकती है। 1999 में आइसी-814 विमान का अपहरण कर उसे कंधार ले जाया गया था और उसके बदले में भारत को तीन खूंखार अपराधियों को छोड़ना पड़ा था। अब्दुल रऊफ छोड़े गए आतंकी अजहर मसूद का रिश्तेदार है और इसी ने विमान अपहरण के लिए धन की व्यवस्था की थी। अदालत ने इसे भगोड़ा घोषित कर रखा है और इसी के आधार पर इंटरपोल ने रेड कार्नर नोटिस जारी किया था। सरकार और जांच एजेंसी में उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि चिली पुलिस ने सीबीआइ को सूचित किया है कि उन्होंने अब्दुल रऊफ नाम के एक व्यक्ति को हिरासत में लिया है|
Thursday, April 7, 2011
बंदूक और गांधीगीरी
मणिपुर में सेना की प्रेरणास्पद पहल पर लेखक की टिप्पणी
मणिपुर के कुछ हिस्सों में एक अलग तरह की ही क्रांति चल रही है। इतने सालों से सेना और अर्द्धसैनिक बल स्थानीय लोगों से बंदूक से निपटते रहे हैं, लेकिन अब वे उन लोगों से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं, जो लड़ाई छोड़ना चाहते हैं। बेंगलूर के एक आध्यात्मिक संगठन, आर्ट आफ लिविंग फाउंडेशन द्वारा चलाए गए गहन आध्यात्मिक तथा व्यावसायिक ट्रेनिंग कार्यक्रम के जरिए पिछले साल आत्म-समर्पण करने वाले 172 से अधिक उग्रवादियों का पुनर्वास किया जा चुका है। कुछ लोग इस रणनीति की आलोचना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सेना को शांति की राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन सशस्त्र सेनाओं को यकीन है कि शांति का यही रास्ता है। उग्रवादियों के परिवारों को संकेत भेजे जा रहे हैं और बंदूक छोड़ने के बदले आकर्षक पुनर्वास पैकेज का वायदा किया जा रहा है। लगता है, संदेश काम कर रहे हैं। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार अगले कुछ महीनों में कुछ और उग्रवादी समर्पण करने जा रहे हैं। उग्रवाद का सामना करने के साथ-साथ सेना द्वारा लोगों के दिलोदिमाग जीतने के लिए चलाई गई कई परियोजनाओं में से एक ध्यान शिविर परियोजना भी है। इसके अलावा दूर-दराज के पर्वतीय इलाकों में चिकित्सा शिविर लगाए जा रहे हैं, शुष्क इलाकों में जलापूर्ति करने, बारूदी सुरंगों के शिकार लोगों को कृत्रिम अंग प्रदान किए जा रहे हैं और पुल बनाए जा रहे हैं। गांवों में फुटबाल के मैदान और स्कूल फिर शुरू किए गए हैं। गांधीगीरी का एक नया रूप देखने में आ रहा है। असम राइफल्स की ऑपरेशन गुड समारिटन रणनीति के तहत सामाजिक प्रयासों के माध्यम से जवान लोगों तक पहुंच रहे हैं। असम राइफल्स के महानिदेशक, लेफ्टिनेंट जनरल रामेश्वर राय कहते हैं, यह मानवीय चेहरे वाला उग्रवाद विरोधी अभियान है। अगर आम आदमी को सेनाओं या सरकार पर भरोसा नहीं है, तो आप उग्रवादियों से कैसे लड़ सकते हैं।सुरक्षा बलों का पहला काम लोगों को जमीनी हकीकतों से रू-ब-रू कराना और उन्हें जबरन वसूली के खिलाफ खड़ा होने में मदद करना था। इसके लिए आतंकवादियों और उनके परिवारों से भावात्मक अपीलें की जा रही हैं। इनका मकसद ऐसे नेतृत्व को अलग-थलग करना और सरकार में लोगों का विश्वास जगाना है। लगता है कि कुछ इलाकों में छवि निर्माण के सुपरिणाम निकले हैं। दक्षिणी मणिपुर में साजिक घाटी का गांवा साजिक ताम्पाक इसका एक उदाहरण है। असम राइफल्स की 8वीं बटालियन के कमांडिंग ऑफीसर कर्नल रविंदर कुमार कहते हैं, पांच साल पहले तक यह गांव विद्रोहियों का गढ़ हुआ करता था। लेकिन अब यह शांति और विकास का एक मॉडल है। पांच साल पहले उग्रवादियों को सीमापार म्यांमार में खदेड़े जाने से पहले असम राइफल्स की बैरकें उग्रवादियों की शिविर हुआ करती थीं। अब इस बटालियन में एक प्राथमिक स्वास्थ्य उप-केंद्र और एक सरकारी हाई स्कूल हैं। इनके अलावा नौजवानों के लिए नौकरियों की व्यवस्था की गई है और सौर-ऊर्जा स्थापित की गई है। अफीम की खेती इस इलाके की सबसे बड़ी समस्या थी। उग्रवादी अफीम की म्यांमार में तस्करी करते थे। सेना ने करोड़ों रुपये की अफीम की फसल काट कर जला डाली और इंफाल के केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को बुलाकर स्थानीय लोगों को शिक्षित किया। उन्हें अदरक, फलों तथा अन्य नकद फसलों के बीज व पौध दीं और इनकी खेती के लिए प्रोत्साहित किया। विकास योजनाओं के जरिए सेना ने लोगों के लिए अवसर उत्पन्न किए। इलाके में निजी वाहनों की बढ़ती संख्या से यहां की समृद्धि का अंदाजा लगाया जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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