अब यह साफ हो गया है कि संसद पर हमले के दोषी अफजल को सुप्रीमकोर्ट की ओर से दी गई फांसी की सजा का मामला आठ माह से गृह मंत्रालय में ही अटका है। 3 अक्टूबर 2006 को दाखिल अफजल की दया याचिका की फाइल दिल्ली सरकार से गत वर्ष जून में मिलने के बावजूद गृह मंत्रालय इसे राष्ट्रपति को भेजने की बजाय अपने पास ही रोके है। हालांकि इस बारे में राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने बार-बार कहा कि ऐसे किसी मामले में गृह मंत्रालय की ओर से कोई कोताही नहीं की जा रही, देरी राष्ट्रपति की ओर से ही हो रही है। मंत्रालय ने 25 में से 23 दया याचिकाएं राष्ट्रपति को भेज दीं हैं। अफजल के मामले पर विचार हो रहा है,जबकि सरकार अभी तक यह कह रही थी कि अफजल का मामला राष्ट्रपति के पास है और उसका नंबर 18वां हैं। वहीं, राष्ट्रपति सचिवालय ने हाल ही में आरटीआइ के तहत दी गई जानकारी में साफ कहा है कि उसके पास सिर्फ 18 मामले हैं। इस सूची में अंतिम नाम बाबूराव तिडके का है और आखिरी अर्जी जय कुमार की है जो 17 जनवरी 2011 को दी गई है। संसद में गृह मंत्रालय की ओर से पेश किए गए ब्योरे के मुताबिक, मंत्रालय ने फांसी के 25 मामलों की सूची दी है, जिनमें राष्ट्रपति के पास दया याचिका लंबित है। ब्योरे के मुताबिक, राष्ट्रपति को अप्रैल 1998 से मई 2004 के बीच 14 दया याचिकाएं भेजी गईं। मई 2004 से नवंबर 2008 के बीच 14 अन्य मामले आए, जिनमें से तीन मंत्रालय के पास विचाराधीन हैं। इसमें अफजल की याचिका शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने यह माना है कि पिछले साल जून में ही दिल्ली के उप-राज्यपाल की ओर से यह फाइल गृह मंत्रालय को लौटा दी गई थी, मगर आठ महीनों से वह इसे अपने ही पास रोके है। मजे की बात यह है कि इसी मामले में देरी के लिए गृह मंत्रालय ने पिछले साल दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार की कड़ी आलोचना की थी। सरकार ने कहा था कि 15 रिमांडर भेजने के बाद दिल्ली के राज्यपाल ने जून 2010 में इस बारे में अपनी टिप्पणी के साथ फाइल गृह मंत्रालय को भेजी है। राज्यसभा में विपक्षी सदस्यों की ओर से इस बारे में बार-बार गृह मंत्रालय को दोषी बताए जाने के बावजूद चिदंबरम ने लगातार यही कहा कि किसी भी मामले में उनके कार्यकाल में गृह मंत्रालय की ओर से कोई देरी नहीं हुई। हर बार उन्होंने राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की ओर ही इशारा किया। उन्होंने इस चर्चा के दौरान राष्ट्रपति का नाम ले कर कहा,वहां हो रही देरी पर वे कुछ कहना नहीं चाहेंगे। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने जब ऐसे फैसले में समय सीमा तय करने के बारे में पूछा तो चिदंबरम का कहना था कि ऐसा करना उचित हीं होगा। हालांकि उन्होंने माना कि इस मामले में केंद्र सरकार की राय राष्ट्रपति को माननी ही होती है
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