Friday, February 25, 2011

माओवाद-उग्रवाद की जड़ बने छोटे हथियार


पूरी दुनिया में आतंकवाद फैलाने में भले ही भारी-भरकम हथियारों और गोला-बारूद की अहम भूमिका हो, मगर पिस्तौलों और बंदूकों समेत छोटे हथियारों की माओवाद, उग्रवाद और मादक पदार्थ संबंधी हिंसा फैलाने में भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। भारत में माओवाद-उग्रवाद की जड़ भी यही छोटे हथियार बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एके-47, एके-56 बंदूकें, पिस्तौलों और देशी कट्टों जैसे छोटे हथियारों की तस्करी आसान होना और बड़े हथियारों पर सरकारों का ज्यादा नियंत्रण होने से छोटे हथियार बहुत सुलभ हैं और दुनिया भर में न केवल आतंकवादियों, बल्कि छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी आतंक फैलाने का आसान जरिया हैं। रक्षा विशेषज्ञ भरत वर्मा उग्रवाद, माओवाद, जिहाद और मादक पदार्थ संबंधी हिंसा का आधारभूत तत्व ऐसे छोटे हथियारों को ही मानते हैं। उनका मानना है कि इनकी आसान उपलब्धता हिंसक तत्वों का काम बहुत आसान कर रही है। वर्मा ने कहा कि चाहे मैक्सिको में मादक पदार्थ संबंधी हिंसा हो, भारत में फैला माओवाद-उग्रवाद हो या दुनिया भर में फैला जिहाद, हिंसा फैलाने वाले सभी तत्व ज्यादातर ऐसे छोटे हथियारों पर ही निर्भर हैं। इसके अलावा कई देश दूसरे देशों को अस्थिर करने के लिए भी चोरी-छिपे उन देशों में छोटे हथियार तस्करी से पहुंचा रहे हैं, क्योंकि यह प्रक्रिया बहुत आसान है। इसका सबसे प्रासंगिक उदाहरण चीन द्वारा पूर्वोत्तर भारत में हथियार पहुंचाना है। वर्मा ने कहा कि अमेरिका जैसे देशों में बंदूक संस्कृति है और इसके चलते वहां बच्चों तक को ये आसानी से उपलब्ध हैं। वर्मा ने पश्चिमी देशों में स्कूलों और कॉलेजों में हिंसा के बढ़ते मामलों के लिए भी इसी पहलू को जिम्मेदार ठहराया। वर्मा इस समस्या के लिए हथियारों के अवैध कारखानों को भी एक बड़ा कारण बताते हैं। छोटे हथियारों से दुनिया में पैदा हो रहे खतरे का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि 2001 के बाद से अमेरिका लगभग 13 लाख छोटे हथियार नष्ट करने की प्रक्रिया में करीब 11 करोड़ डॉलर की राशि खर्च कर चुका है। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने भी इस बात पर चिंता जाहिर की थी कि दुनिया भर में नियंत्रण लगाए जाने के बावजूद लगभग 50 करोड़ छोटे हथियार अवैध तौर पर मौजूद हैं, जिनके बारे में पता लगाया जाना बहुत मुश्किल है। छोटे हथियारों के प्रसार पर नियंत्रण लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 2001 में हल्के और छोटे हथियारों के अवैध व्यापार को रोकने के प्रयासों पर एक सम्मेलन का आयोजन किया था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया। इस सम्मेलन में शामिल सभी देशों के लिए इस दिशा में की गई प्रगति के बारे में संयुक्त राष्ट्र को जानकारी देना जरूरी किया गया। रक्षा विशेषज्ञ डॉ. अरुण दत्ता इस बात पर जोर देते हैं कि गुरिल्ला युद्ध को मौजूदा स्वरूप देने का श्रेय भी छोटे हथियारों को दिया जा सकता है। डॉ. दत्ता के मुताबिक, देश में गुरिल्ला रणनीति के तहत लड़ा जाने वाला माओवाद सालों से चला आ रहा है, लेकिन इतना हिंसक इसके पहले कभी नहीं था। पहले जो माओवादी लाठियों से लड़ते थे, वे अब बंदूकों और पिस्तौलों से लड़ रहे हैं, कोई ना समझने वाला भी बता सकता है कि इसके पीछे छोटे हथियार ही सबसे बड़ा कारण हैं। उन्होंने बताया, जिन इलाकों में वे रहते हैं, वहां उनके लिए ऐसे हथियार पाना ही सबसे आसान है। सीमाओं से इनकी आसानी से तस्करी होती है और इन्हें जंगलों में छिपाना बहुत आसान है। रही-सही कसर माओवादी और उग्रवादी इन्हें सुरक्षा बलों से लूट कर पूरी कर लेते हैं। इस पर नियंत्रण कैसे लगे, इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, इस समस्या पर नियंत्रण केवल एक देश के प्रयासों से नहीं लग सकता। यह पूरी दुनिया की समस्या है। एक देश इन पर लगाम लगा भी ले, तो दूसरे देश से आने वाली समस्या का क्या किया जा सकता है। जब तक पूरे विश्व में इस बात को लेकर समन्वय नहीं हो पाएगा, तब तब इस समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सकता।

Wednesday, February 23, 2011

गृह मंत्रालय ने दबाई अफजल की फाइल


अब यह साफ हो गया है कि संसद पर हमले के दोषी अफजल को सुप्रीमकोर्ट की ओर से दी गई फांसी की सजा का मामला आठ माह से गृह मंत्रालय में ही अटका है। 3 अक्टूबर 2006 को दाखिल अफजल की दया याचिका की फाइल दिल्ली सरकार से गत वर्ष जून में मिलने के बावजूद गृह मंत्रालय इसे राष्ट्रपति को भेजने की बजाय अपने पास ही रोके है। हालांकि इस बारे में राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने बार-बार कहा कि ऐसे किसी मामले में गृह मंत्रालय की ओर से कोई कोताही नहीं की जा रही, देरी राष्ट्रपति की ओर से ही हो रही है। मंत्रालय ने 25 में से 23 दया याचिकाएं राष्ट्रपति को भेज दीं हैं। अफजल के मामले पर विचार हो रहा है,जबकि सरकार अभी तक यह कह रही थी कि अफजल का मामला राष्ट्रपति के पास है और उसका नंबर 18वां हैं। वहीं, राष्ट्रपति सचिवालय ने हाल ही में आरटीआइ के तहत दी गई जानकारी में साफ कहा है कि उसके पास सिर्फ 18 मामले हैं। इस सूची में अंतिम नाम बाबूराव तिडके का है और आखिरी अर्जी जय कुमार की है जो 17 जनवरी 2011 को दी गई है। संसद में गृह मंत्रालय की ओर से पेश किए गए ब्योरे के मुताबिक, मंत्रालय ने फांसी के 25 मामलों की सूची दी है, जिनमें राष्ट्रपति के पास दया याचिका लंबित है। ब्योरे के मुताबिक, राष्ट्रपति को अप्रैल 1998 से मई 2004 के बीच 14 दया याचिकाएं भेजी गईं। मई 2004 से नवंबर 2008 के बीच 14 अन्य मामले आए, जिनमें से तीन मंत्रालय के पास विचाराधीन हैं। इसमें अफजल की याचिका शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने यह माना है कि पिछले साल जून में ही दिल्ली के उप-राज्यपाल की ओर से यह फाइल गृह मंत्रालय को लौटा दी गई थी, मगर आठ महीनों से वह इसे अपने ही पास रोके है। मजे की बात यह है कि इसी मामले में देरी के लिए गृह मंत्रालय ने पिछले साल दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार की कड़ी आलोचना की थी। सरकार ने कहा था कि 15 रिमांडर भेजने के बाद दिल्ली के राज्यपाल ने जून 2010 में इस बारे में अपनी टिप्पणी के साथ फाइल गृह मंत्रालय को भेजी है। राज्यसभा में विपक्षी सदस्यों की ओर से इस बारे में बार-बार गृह मंत्रालय को दोषी बताए जाने के बावजूद चिदंबरम ने लगातार यही कहा कि किसी भी मामले में उनके कार्यकाल में गृह मंत्रालय की ओर से कोई देरी नहीं हुई। हर बार उन्होंने राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की ओर ही इशारा किया। उन्होंने इस चर्चा के दौरान राष्ट्रपति का नाम ले कर कहा,वहां हो रही देरी पर वे कुछ कहना नहीं चाहेंगे। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने जब ऐसे फैसले में समय सीमा तय करने के बारे में पूछा तो चिदंबरम का कहना था कि ऐसा करना उचित हीं होगा। हालांकि उन्होंने माना कि इस मामले में केंद्र सरकार की राय राष्ट्रपति को माननी ही होती है

Monday, February 14, 2011

आंतरिक सुरक्षा की चिंता


आजकल देश की आंतरिक सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है। आतंकवाद, क्षेत्रवाद और माओवाद देश को कमजोर कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बता चुके हैं। जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य होते देखकर आतंकवादियों के हौसले पस्त हो रहे हैं। अपना खौफ कायम रखने के लिए वे निर्दोष लोगों की हत्याएं कर रहे हैं। सोपोर में दो सगी बहनों की हत्या इसी साजिश का हिस्सा है। वहां जैसे-जैसे माहौल सुधर रहा है, वैसे-वैसे आतंकवादियों में आक्रोष पैदा हो रहा है। सोपोर में आतंकवादियों द्वारा की गई यह घटना बड़ी सोची-समझी साजिश का हिस्सा लगती है। ताकि लोगों के मन में भय का माहौल बनें, लोग आतंक के साए में जीते रहें और आतंकी अपने नापाक इरादों में कामयाब होते रहें। मुंबई में 26/11 के हमले के बाद आतंकवाद से निपटने के लिए आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण केंद्र बनाने की योजना बनाई जा रही थी, क्योंकि ऐसे केंद्र न होने के कारण राष्ट्र को काफी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ रहा था। इसी को ध्यान में रखते हुए देश का पहला और विश्व का तीसरा आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण केंद्र महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले के बारामती तहसील स्थित बर्हाणपुर में बनने जा रहा है। विश्व में केवल इजराइल व बांग्लादेश के ढाका में उक्त केंद्र हैं। बारामती में हवाई अड्डा होने के कारण आपातकालीन स्थिति में प्रशिक्षण केंद्र के जवानों को अच्छा प्रशिक्षण दिया जा सकेगा। बर्हाणपुर, बारामती से केवल दस किलोमीटर दूरी पर है। नेशनल सिक्यूरिटी गार्ड (एनएसजी) को जिस प्रकार से प्रशिक्षण दिया जाता है, उसी तरह इस केंद्र के जवानों को भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। आतंकवाद विरोधी प्रशिक्षण देते समय विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण केंद्र, विश्वविद्यालय, सेना, अ‌र्द्धसैनिक बल, संरक्षण विषयक संस्थाओं तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सहयोग लिया जाएगा। एक ही समय देश के लगभग 300 जवानों को केंद्र में प्रशिक्षण दिया जाएगा। केंद्र में प्रशिक्षणार्थियों के लिए छात्रावास, पुस्तकालय, फायरिंग रेंज, परेड ग्राउंड, अध्ययन कक्ष आधुनिक पद्धति से बनाए जाएंगे। उनके लिए पढ़ाई एवं अनुसंधान के लिए भी विभिन्न विषयों का चयन किया गया है। आतंकवादी हमलों का विचार करते हुए बांध, हवाई अड्डा, पेट्रोलियम पदार्थों के भंडार के स्थान तथा धार्मिक स्थानों की सुरक्षा के बारे में जवानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। साइबर क्राइम के बारे में जानकारी, अंतराष्ट्रीय संबंध, सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थिति के बारे में व्याख्यानों, परिचर्चाओं एवं संगोष्ठियों का प्रशिक्षण केंद्र में आयोजन किया जाएगा। इस प्रशिक्षण केंद्र के बन जाने से न केवल आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में सहयोग मिलेगा, बल्कि देश में हो रहे आंतरिक सुरक्षा कार्यक्रम में भी इस केंद्र का महत्वपूर्ण योगदान होगा। देश के कई राज्यों में नक्सलवाद अपने पैर पसार रहा है, जिनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है। यहां ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू होने के बाद 2009 में 87, 2010 में 252 और 2011 के जनवरी माह तक 11 माओवादियों की गिरफ्तारी हुई। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में भी वर्ष 2010 के दौरान 274 माओवादियों को गिरफ्तार किया गया और तीन ने आत्मसमर्पण किया। नक्सल प्रभावित राज्यों में कई नक्सलवादियों को गिरफ्तार किया गया है- बिहार में 187, झारखंड में 180, उड़ीसा में 163, आंध्र प्रदेश में 77, महाराष्ट्र में 43, उत्तर प्रदेश में 35 और कर्नाटक में 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया। आतंकवाद, नक्सलवाद और माओवाद की चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलकर इस दिशा में काम करने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Wednesday, February 9, 2011

हेडली के खिलाफ पाक से सबूत मांगेगी एनआइए


देश में आतंकी मामलों की जांच के लिए गठित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य डेविड हेडली से मिली जानकारी के सिलसिले में सबूत हासिल करने के लिए पाकिस्तान से न्यायिक अनुरोध करने की योजना बना रही है। इससे पहले पाकिस्तान ने एजेंसी को उनके देश में आकर जांच करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। एनआइए के एक दल ने करीब साल भर पहले अमेरिकी जेल में मुंबई हमले के सूत्रधारों में शामिल डेविड हेडली से पूछताछ की थी और अब उसे उसके बयानों के सत्यापन के लिए उसकी परिसंपत्ति, बैंक खातों, उसके सहयोगियों के विवरण की जरूरत है। ये विवरण पड़ोसी देश के पास उपलब्ध हो सकते हैं क्योंकि वह भी इस मामले की जांच कर रहा है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार एजेंसी ने हेडली और उसके कनाडाई सहयोगी तहव्वुर हुसैन राणा के खिलाफ पाकिस्तान से सबूत की मांग करते हुए मुंबई अदालत के माध्यम से अनुरोध पत्र भेजने के लिए केंद्र से अनुमति ले ली है। राणा पर मुंबई हमले के दौरान आतंकवादियों की मदद करने का आरोप है। आग्रह पत्र विदेशी अदालत से न्यायिक सहायता के लिए एक औपचारिक अनुरोध होता है। सूत्रों ने कहा कि आग्रह पत्र के संबंध में ब्योरे को अंतिम रूप दे दिया गया है और उसे मुंबई अदालत को सौंप दिया गया है, जो उसे संबंधित पाकिस्तानी अदालत को अग्रसारित करेगी। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान द्वारा सबूत हस्तांतरित किए जाने के बाद एनआइए को दोनों के खिलाफ आरोप तय करने में मदद मिलेगी। दोनों ही फिलहाल अमेरिकी हिरासत में हैं। आग्रह पत्र के माध्यम से सबूत मांगने की प्रक्रिया इस जांच में सहयोग के लिए गृह मंत्रालय की ओर से भेजे गए कई डोजियर से अलग है।


Monday, February 7, 2011

कश्मीर के लिए जेयूडी ने की परमाणु युद्ध की वकालत


पाकिस्तानी आतंकी संगठन जमात-उद-दावा (जेयूडी) ने भारत के खिलाफ जिहाद का ऐलान करते हुए कश्मीर के लिए लड़ाई में परमाणु युद्ध की वकालत की है। कश्मीर एकता दिवस के उपलक्ष्य में लाहौर के मुख्य मार्ग पर शनिवार को आयोजित रैली में जेयूडी सरगना हाफिज सईद ने कहा-कश्मीर की लड़ाई में जिहाद को अपनाया जाना चाहिए। भले ही भारत के साथ परमाणु युद्ध ही क्यों न छिड़ जाए। सईद ने कहा-मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संदेश देना चाहता हूं कि कश्मीर को छोड़ दें या युद्ध के लिए तैयार रहें। कश्मीर समस्या के हल का एकमात्र रास्ता जिहाद है। जाहिर हो कि हाफिज सईद मुंबई हमले-26/11 का मास्टरमाइंड है। सईद ने कहा कि जिहाद तब तक जारी रहना चाहिए जब तक कश्मीर पर भारत का अधिकार है। इसके लिए भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु यद्ध होने पर भी कोई समस्या नहीं है। जेयूडी के दूसरे नंबर के सरगना अब्दुर्रहमान मक्की की मांग थी कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को कश्मीर में जिहाद के लिए एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाना चाहिए। यदि प्रधानमंत्री उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं तो जेयूडी इस मंत्रालय को राशि उपलब्ध कराएगा। मक्की ने कहा कि वह जिहाद के लिए दस लाख प्रशिक्षित लड़ाके उपलब्ध करा सकता है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख से उसकी मांग थी कि वह लड़ाकों को राइफल उपलब्ध कराएं। जमात-ए-इस्लामी के महासचिव लियाकत बलोच ने भी कहा कि मुस्लिमों के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे जिहाद के लिए तैयार रहें। सईद के एक प्रमुख सहयोगी और कश्मीर एक्शन कमेटी के चेयरमैन हाफिज सैफुल्लाह मंसूर ने कहा कि यदि कश्मीर के लिए युद्ध में परमाणु हथियार की आवश्यकता हो तो सरकार को इसका प्रयोग करना चाहिए। मरकजी जमीयत अहल-ए-हदीस के नेता राणा नसरुल्लाह ने कहा कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार केवल निवारण के लिए नहीं हैं। कश्मीर की आजादी के लिए भारत के विरुद्ध इसका प्रयोग किया जाना चाहिए।