Thursday, March 3, 2011

नक्सलवाद से लड़ाई


बलों को सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने पर दिलीप घोष की टिप्पणी
आखिरकार नक्सलियों ने उड़ीसा में मलकानगिरि के जिला कलेक्टर आरवी कृष्ण को रिहा कर दिया। उनके सहायक इंजीनियर पवित्र माझी को दो दिन पहले छोड़ दिया गया था, लेकिन इन दोनों की रिहाई राज्य सरकार द्वारा नक्सलियों की सभी 14 मांगें माने जाने के बाद हो पाई। इन दोनों को एक गांव से 16 फरवरी को अगवा किया गया था, जहां जिला कलेक्टर ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम का उद्घाटन करने गए थे। जाहिर है उनकी रिहाई राज्य सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थों, प्रोफेसर दंडपाणि मोहंती और प्रोफेसर जी हरगोपाल द्वारा कड़ी सौदेबाजी के बाद हो पाई। इससे कुछ दिन पहले नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल के पांच सिपाहियों को अगवा किया था, जिन्हें18 दिन बाद नक्सलविरोधी अभियानों को रोके जाने के बाद ही रिहा किया गया। इसके अगले दिन स्वामी अग्निवेश के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने रायपुर में कहा कि यह अपहरण और बाद में रिहाई एक मोड़ है। अब हमें विचार करना होगा कि क्या छत्तीसगढ़ में शांति प्रक्रिया शुरू की जा सकती है? एक तरह से यह स्वीकारोक्ति थी कि नक्सली खतरे पर अंकुश लगाने में वांछित परिणाम नहीं निकले गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने दिल्ली में आंतरिक सुरक्षा के मसले पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में कहा कि मैं समझता हूं कि एक गतिरोध बना हुआ है। उम्मीद की जा रही थी कि अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या के बाद सरकार नक्सलियों के खिलाफ अभियान तेज करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अपने भाषण में गृहमंत्री ने कहा कि इस भीषण कांड के बाद, नक्सलविरोधी अभियानों में एक स्पष्ट ठहराव आया है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मियों का उपलब्ध न होना और जो उपलब्ध है उनमें सही प्रशिक्षण की कमी। इस बीच नक्सलवादियों ने इस ठहराव की अवधि का इस्तेमाल खुद को फिर से संगठित करने में किया है। चिदंबरम के मुताबिक नक्सलियों ने पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की कम से कम चार कंपनियां खड़ी कर ली हैं। समस्या के विस्तार और भयावहता को देखते हुए सरकार ने सशस्त्र सेनाओं के विकल्प पर विचार भी किया था। बाद में, सेना और वायुसेना के कड़े एतराज को देखते हुए यह विचार त्याग दिया गया। शायद हालात इतने बेकाबू नहीं हुए हैं कि सशस्त्र सेनाओं के हस्तक्षेप की जरूरत हो, लेकिन नक्सलवादियों की चुनौती से निपटने के लिए राज्य पुलिस और अ‌र्द्घसैनिक बलों को उचित ट्रेनिंग देने का वक्त आ गया है। सेना इन बलों को प्रशिक्षित कर रही है, लेकिन इस काम में तेजी लाने की जरूरत है। इनकी ट्रेनिंग के लिए सेना, राजस्थान में महाजन रेंज और हरियाणा में नारायणगढ़ रेंज जैसे अपने प्रशिक्षण मैदानों का इस्तेमाल कर रही है। सेना, हिमाचल प्रदेश के नाहन स्थित अपने ट्रेनिंग स्कूल को छत्तीसगढ़ में बस्तर ले जाने की सोच रही है। इसके अलावा, जंगल युद्घ स्कूल खोलने के लिए सेना को राज्य के नारायणपुर में 500 वर्ग किलोमीटर वनभूमि देने का प्रस्ताव दिया गया है। मध्य कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल विजय अहलूवालिया कहते हैं कि दो-तीन जगहों पर विचार किया जा रहा है, लेकिन यह स्कूल चार हजार वर्ग किमी में फैले अबूझमाड़ जंगल के भीतर स्थित होगा। हालांकि सेना ने नक्सलविरोधी अभियानों में सीधे तौर पर भाग लेने से इंकार किया है, लेकिन जंगल में इतने बड़े प्रतिष्ठान के होने से विद्रोहियों के साथ इसके टकराव की पूरी संभावना है। सेना ने सरकार से दिशानिर्देश मांगे हैं कि अगर सैन्यकर्मियों पर हमला होता है और आत्मरक्षार्थ गोली चलाने की नौबत आ जाती है, तो उन्हें क्या करना होगा|

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