Tuesday, March 22, 2011
Tuesday, March 8, 2011
Sunday, March 6, 2011
कश्मीर में आतंक के कारण खोजेगा आयोग
जम्मू मुख्यमंत्री उमर अब्दुला ने कश्मीर के लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन(टीआरसी) बनाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि इस आयोग के जरिये यह पता लगाया जाएगा कि राज्य में मौतों, तबाही और आतंक के लिए कौन जिम्मेदार है। मुख्यमंत्री के अनुसार, इस संबंध में जल्द ही विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर उसे मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। यह एक ऐसा कमीशन होगा जिसका जम्मू-कश्मीर की सियासत से कोई लेना-देना नहीं होगा। ज्ञात हो कि अशांति-अव्यवस्था के दौर की सच्चाई जानने और मेल-मिलाप की प्रक्रिया शुरू करने के उद्देश्य से अब तक अनेक देशों में ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन गठित किए जा चुके हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चित रहा था दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला द्वारा गठित किया गया आयोग। इस आयोग का उद्देश्य रंगभेद दौर के अत्याचारों को सामने लाना था। राज्यपाल के अभिभाषण पर विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए उमर ने कहा कि जम्मू-कश्मीर न तो मिस्र है, न ही लीबिया और न ही टयूनीशिया। मेरी उम्र चालीस वर्ष नहीं हुई है और पिछले नौ वर्षों में मैं चौथा सीएम हूं। कुछ लोग नौजवानों को गुमराह कर रहे हैं। नौजवान गुमराह न हों, पत्थर मारने या हड़ताल करने की जरूरत नहीं। जब आप मुझे खड़े होकर कहोगे, मैं कुर्सी छोड़ दूंगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि समय-समय पर बात उठती है कि हजारों नौजवान गायब हैं, कई हिरासत में मारे गए हैं, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद कब शुरू हुआ, किन हालात ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से भागने पर मजबूर किया.। अब वक्त आ गया है कि लोगों को इन सवालों का जवाब मिले और सच का पता चले। विपक्ष की अनुपस्थिति में मुख्यमंत्री पीडीपी पर भी जमकर बरसे। उमर ने कहा कि राज्य में आतंकवाद कम हुआ है। सरकार का नौजवानों को तंग करने का इरादा नहीं है। श्रीनगर से चालीस बंकर उठाए गए हैं। सीआरपीएफ की दो बटालियन कम हुई हैं। आतंकियों की पुनर्वास नीति का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि छह सौ से अधिक आवेदन आए हैं, जिन पर जांच चल रही है। वह दिन दूर नहीं जब सीमा पार ट्रेनिंग के लिए गए आतंकी लौटकर मुख्य धारा में जीवन व्यतीत करेंगे।
Thursday, March 3, 2011
पाकिस्तान के अल्संख्यक मंत्री भी ईशनिंदा की भेंट चढ़े
पाकिस्तान का ईशनिंदा कानून दो महीने के भीतर सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के दूसरे बड़े नेता की हत्या का कारण बना है। बुधवार को कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की दिनदहाड़े सरेआम गोलियां बरसा कर हत्या कर दी। 42 वर्ष के भट्टी केंद्रीय मंत्रिमंडल में एकमात्र ईसाई सदस्य थे। कुछ रिपोर्टो में भट्टी की हत्या के लिए आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान को जिम्मेदार बताया गया है। हत्यारों ने मौका-ए-वारदात से भागते वक्त पर्चे फेंके, जिन पर फिदायीन ए मुहम्मद और पंजाब अल-कायदा के नाम लिखे थे। उनमें उर्दू में लिखा था कि जो भी पैगंबर मुहम्मद की निंदा करेगा, उसे मौत दी जाएगी। इन संगठनों के नाम पाकिस्तान में ईशनिंदा की आड़ में हुई हत्याओं के मामले में पहले आ चुके हैं। इससे पहले इस साल चार जनवरी को पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर को उनके ही अंगरक्षक ने गोलियों से छलनी कर दिया था। नहीं थे सुरक्षागार्ड टेलीविजन रिपोर्टो के अनुसार, भट्टी दोपहर 11 बजकर 20 मिनट पर कैबिनेट की बैठक में भाग लेने से लिए जा रहे थे। उनके साथ उनकी भतीजी और ड्राइवर थे। खास बात यह कि उस समय उनके साथ कोई सुरक्षागार्ड नहीं था। जब भट्टी कार में बैठ गए, तभी एक अन्य कार से हमलावर आए। वे चार थे। उनके हाथ में बंदूकें थीं। उन्होंने कार को घेर लिया। उनमें से तीन कार के नजदीक गए और ड्राइवर तथा भट्टी की भतीजी को खींच कर कार से उतार दिया। इसके बाद हमलावरों ने बंदूकों के मुंह खोल दिए। भट्टी को तत्काल पास के अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वह पहले ही दम तोड़ चुके थे। आठ गोलियां उनके जिस्म में लगीं थीं। मां से आखिरी मुलाकात इस्लामाबाद पुलिस प्रमुख वाजिद दुर्रानी ने मीडिया से कहा कि हत्यारे सफेद कार में आए थे और शलवार-कमीज पहने थे। उन्होंने बताया कि मंत्री को दो एस्कॉर्ट गाडि़यां और अर्द्धसैनिक बल के गार्ड्स दिए गए थे। भट्टी अपनी मां से मिलने के लिए उनके घर गए थे। जब वे बाहर निकल कर आए, तभी यह हादसा हुआ। दुर्रानी ने बताया कि भट्टी ने अपने सुरक्षा गार्डो से कहा था कि वह अपनी मां से मिल कर जल्दी ही लौट आएंगे। अत: दफ्तर में ही उनका इंतजार करें। भट्टी को उनके उदारवादी नजरिये और अल्पसंख्यकों के हितों का पक्षधर होने के कारण पहले भी हत्या की धमकियां मिल चुकी थीं। सरकार भी इन धमकियों के प्रति संवेदनशील थी। इसलिए जहां दूसरे मंत्रियों को मात्र एक एस्कॉर्ट गाड़ी दी गई, भट्टी को दो गाडि़यां मिली हुई थीं। वेटिकन ने चिंता जताई वेटिकन सिटी : वेटिकन ने पाकिस्तान में इस्लामिक ईशनिंदा कानून का विरोध करने वाले ईसाई मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या को जघन्य अपराध करार दिया है। वेटिकन ने पाकिस्तान से ईसाइयों की सुरक्षा के लिए इंतजाम करने मांग भी की है। वेटिकन प्रवक्ता फेडरिको लोम्बार्डी ने कहा, हम इस अवर्णनीय हिंसात्मक कृत्य की निंदा करते हैं। पाकिस्तान में घृण का शिकार हो रहे ईसाइयों से हम निकटता भी प्रदर्शित करते हैं और हम धार्मिक स्वतंत्रता खासकर हिंसा और उत्पीड़न का शिकार हो रहे ईसाइयों की धार्मिक आजादी की तत्काल रक्षा की अपील करते हैं। वेटिकन लंबे समय से पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून में बदलाव की मांग कर रहा है। अब निशाने पर शेरी रहमान? लाहौर, एजेंसी : पाकिस्तान में पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या के बाद पूर्व सूचना और प्रसारण मंत्री शेरी रहमान को लेकर आशंकाएं पैदा हो गई हैं। तीनों ने ही ईशनिंदा कानून में सुधार करने की मांग करके कट्टरपंथियों की नाराजगी मोल थी। अब चर्चा है कि क्या चरमपंथी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की नेता शेरी रहमान को निशाना बना सकते हैं? मारे गए दोनों नेता भी पीपीपी से थे। रहमान ने पाकिस्तान विधानसभा में निजी प्रस्ताव पेश कर इस कानून में बदलाव की मांग की थी। हालांकि बाद में उन्होंने पीपीपी के शीर्ष नेताओं के दबाव में आकर अपने प्रस्ताव को वापस ले लिया था। प्रस्ताव लाने के बाद उन्हें चरमपंथियों की धमकियां मिलने लगी थीं। फरवरी में मुल्तान की जिला अदालत ने प्रांतीय पुलिस से शेरी रहमान के खिलाफ ईशनिंदा कानून के तहत मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। फहीम गुल नाम के शख्स ने कोर्ट में दायर अर्जी में दा वा किया था कि रहमान ने पिछले साल नवंबर में टीवी कार्यक्रम में ईशनिंदा कानून की आलोचना की थी|
नक्सलवाद से लड़ाई
बलों को सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने पर दिलीप घोष की टिप्पणी
आखिरकार नक्सलियों ने उड़ीसा में मलकानगिरि के जिला कलेक्टर आरवी कृष्ण को रिहा कर दिया। उनके सहायक इंजीनियर पवित्र माझी को दो दिन पहले छोड़ दिया गया था, लेकिन इन दोनों की रिहाई राज्य सरकार द्वारा नक्सलियों की सभी 14 मांगें माने जाने के बाद हो पाई। इन दोनों को एक गांव से 16 फरवरी को अगवा किया गया था, जहां जिला कलेक्टर ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम का उद्घाटन करने गए थे। जाहिर है उनकी रिहाई राज्य सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थों, प्रोफेसर दंडपाणि मोहंती और प्रोफेसर जी हरगोपाल द्वारा कड़ी सौदेबाजी के बाद हो पाई। इससे कुछ दिन पहले नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल के पांच सिपाहियों को अगवा किया था, जिन्हें18 दिन बाद नक्सलविरोधी अभियानों को रोके जाने के बाद ही रिहा किया गया। इसके अगले दिन स्वामी अग्निवेश के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने रायपुर में कहा कि यह अपहरण और बाद में रिहाई एक मोड़ है। अब हमें विचार करना होगा कि क्या छत्तीसगढ़ में शांति प्रक्रिया शुरू की जा सकती है? एक तरह से यह स्वीकारोक्ति थी कि नक्सली खतरे पर अंकुश लगाने में वांछित परिणाम नहीं निकले गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने दिल्ली में आंतरिक सुरक्षा के मसले पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में कहा कि मैं समझता हूं कि एक गतिरोध बना हुआ है। उम्मीद की जा रही थी कि अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या के बाद सरकार नक्सलियों के खिलाफ अभियान तेज करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अपने भाषण में गृहमंत्री ने कहा कि इस भीषण कांड के बाद, नक्सलविरोधी अभियानों में एक स्पष्ट ठहराव आया है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मियों का उपलब्ध न होना और जो उपलब्ध है उनमें सही प्रशिक्षण की कमी। इस बीच नक्सलवादियों ने इस ठहराव की अवधि का इस्तेमाल खुद को फिर से संगठित करने में किया है। चिदंबरम के मुताबिक नक्सलियों ने पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की कम से कम चार कंपनियां खड़ी कर ली हैं। समस्या के विस्तार और भयावहता को देखते हुए सरकार ने सशस्त्र सेनाओं के विकल्प पर विचार भी किया था। बाद में, सेना और वायुसेना के कड़े एतराज को देखते हुए यह विचार त्याग दिया गया। शायद हालात इतने बेकाबू नहीं हुए हैं कि सशस्त्र सेनाओं के हस्तक्षेप की जरूरत हो, लेकिन नक्सलवादियों की चुनौती से निपटने के लिए राज्य पुलिस और अर्द्घसैनिक बलों को उचित ट्रेनिंग देने का वक्त आ गया है। सेना इन बलों को प्रशिक्षित कर रही है, लेकिन इस काम में तेजी लाने की जरूरत है। इनकी ट्रेनिंग के लिए सेना, राजस्थान में महाजन रेंज और हरियाणा में नारायणगढ़ रेंज जैसे अपने प्रशिक्षण मैदानों का इस्तेमाल कर रही है। सेना, हिमाचल प्रदेश के नाहन स्थित अपने ट्रेनिंग स्कूल को छत्तीसगढ़ में बस्तर ले जाने की सोच रही है। इसके अलावा, जंगल युद्घ स्कूल खोलने के लिए सेना को राज्य के नारायणपुर में 500 वर्ग किलोमीटर वनभूमि देने का प्रस्ताव दिया गया है। मध्य कमान प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल विजय अहलूवालिया कहते हैं कि दो-तीन जगहों पर विचार किया जा रहा है, लेकिन यह स्कूल चार हजार वर्ग किमी में फैले अबूझमाड़ जंगल के भीतर स्थित होगा। हालांकि सेना ने नक्सलविरोधी अभियानों में सीधे तौर पर भाग लेने से इंकार किया है, लेकिन जंगल में इतने बड़े प्रतिष्ठान के होने से विद्रोहियों के साथ इसके टकराव की पूरी संभावना है। सेना ने सरकार से दिशानिर्देश मांगे हैं कि अगर सैन्यकर्मियों पर हमला होता है और आत्मरक्षार्थ गोली चलाने की नौबत आ जाती है, तो उन्हें क्या करना होगा|
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