Monday, February 27, 2012

कमजोर पड़ रहे आतंकी, बम धमाके हुए आधे


पिछले कई दशकों से दुनिया भर में दहशत फैलाने वाले आतंकी आखिरकार कमजोर होने लगे हैं। इसे सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी का नतीजा कहें या फिर दहशतगर्दी से आम जनता की बेरुखी, पर पांच साल पहले की तुलना में दुनिया भर में अब लगभग आधे आतंकी हमले हो रहे हैं। इनमें भी 80 फीसदी से अधिक आतंकी घटनाएं केवल चार देशों भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और इराक में हुई है। अकेला पाकिस्तान ऐसा मुल्क है, जहां पिछले पांच सालों में आतंकी घटनाएं कम होने के बजाय तेजी से बढ़ी हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के आंकड़ों के अनुसार 2007 में 1559 आतंकी बम धमाकों की तुलना में 2011 में केवल 1055 बम धमाके हुए। वैसे इस बीच 2008 में सबसे अधिक 2030 बम धमाके हुए, पर 2008 के बाद इन बम धमाकों की संख्या तेजी से कम होती गई। 2009 में 1358 और 2010 में 1329 बम धमाके हुए। वर्ष 2011 में इन हमलों की संख्या 1055 रह गईं, लेकिन जहां दुनिया भर में आतंकी हमलों में कमी आई है, वहीं पाकिस्तान में आतंकियों के हौसलेबुलंद हैं। 2007 में पाक में आतंकियों ने केवल 236 बम धमाके किए थे, जो 2011 में 376 हो गए। वैसे आकंड़ों का विश्लेषण बताता है कि भारत में आतंकियों के हौसले पस्त होने लगे हैं। 2007 में आतंकियों के 557 बम धमाकों की तुलना में 2011 में केवल 245 बम धमाके हुए हैं। सुरक्षा एजेंसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का मानना है कि पिछले एक दशक में आतंकियों की फंडिंग रोकने के लिए किए गए प्रयासों का परिणाम दिखने लगा है। अलकायदा से लेकर सभी आतंकी संगठनों के लिए अब फंड जुटाना आसान नहीं रह गया है। इसके साथ ही विभिन्न देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल भी पहले के मुकाबले बेहतर हुआ है। इससे बड़ी संख्या में आतंकी हमलों को रोकने में सफलता मिली है। वैसे कुछ अधिकारियों का मानना है कि आतंकियों के असली मंसूबों के बारे में आम जनता जागरूक होने लगी है। जाहिर है इससे आतंकियों को मिलने वाले समर्थन में बेहद कमी आई है। आइजी जम्मू दिलबाग सिंह ने बताया कि पिछले बाइस सालों से आतंकवादियों से लोहा ले रही जम्मू-कश्मीर पुलिस के लिए साल 2011 सबसे बेहतर रहा। वर्ष की शुरुआत में जम्मू संभाग में 84 आतंकी सक्रिय थे, जबकि अंत में उनकी संख्या सिर्फ 33 रह गई।

Wednesday, February 15, 2012

आतंकरोधी केंद्र के खिलाफ लामबंद हुए राज्य


राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के गठन के तुरंत बाद ही राज्यों ने इसके खिलाफ लामबंदी शुरू कर दी हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा ने इसे राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र भी लिखे हैं। दोनों ही मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर एक दूसरे के संपर्क में भी हैं। एनसीटीसी पर यह राजनीतिक कवायद ऐसे समय सामने आई है जब एक दिन पहले ही नई दिल्ली में इजरायली दूतावास की कार को आतंकवादियों ने अपना निशाना बनाया है। ममता बनर्जी का कहना है कि एनसीटीसी को लेकर गृह मंत्रालय जो नीति अपना रहा है, उससे राज्य की कानून-व्यवस्था में उसका सीधा हस्तक्षेप हो जाएगा, जिसे उनकी सरकार कतई नहीं मानेगी। गौरतलब है कि एनसीटीसी को पहली मार्च से काम शुरू करना है और ऐसे में राज्यों द्वारा आपत्तियां उठाए जाने से केंद्र सरकार के सामने दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं। 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद गृह मंत्री पी.चिदंबरम ने एनसीटीसी जैसे उच्च क्षमता संपन्न संगठन के गठन का प्रस्ताव रखा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हस्तक्षेप का आग्रह किए जाने के एक दिन बाद ही ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक सोमवार को अचानक सक्रिय हो गए और उन्होंने एनसीटीसी की शक्तियों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। पटनायक ने तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जलललिता से अनुरोध किया कि वे इस एकतरफा और अधिनायकवादी कदम का विरोध करें जो राज्यों के वैधानिक अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है। यही नहीं ममता बनर्जी से इस मुद्दे पर रविवार को ही बात करने वाले पटनायक ने एक बार फिर से तृणमूल सुप्रीमो से चर्चा की। पटनायक ने आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को भी इसके बारे में जानकारी दी। पटनायक अब इस मसले पर बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू नेता नीतीश कुमार से चर्चा करेंगे, जो कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के प्रमुख घटक हैं। पटनायक ने जयललिता को लिखे पत्र में कहा है कि तमिलनाडु सरकार को राज्यों की संघीय ताकत के अतिक्रमण की मुखालफत करनी चाहिए। आम चुनाव से दो साल पहले ही ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल के मुखिया के इस कदम को गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को एकजुट करने की कोशिश और भाजपा व वाम दलों से अलग एक नया मोर्चा तैयार करने के तौर पर देखा जा रहा है। ममता बनर्जी के निर्देश पर गृह विभाग ने केंद्र को पत्र लिखकर कहा है कि केंद्र ने एनसीटीसी जैसे संगठन के गठन से पहले किसी भी राज्य से विचार-विमर्श नहीं किया। पत्र में कहा गया है कि यूएपीए कानून के तहत, एनसीटीसी आतंकियों को पकड़ने के लिए किसी भी सूबे में वहां की सरकार की मंजूरी लिए बिना अभियान चला सकता है। संदेह के आधार पर कभी भी किसी को गिरफ्तार किया जा सकता है, जरूरत पर राज्य के किसी भी पुलिस बल का इस्तेमाल कर सकता है। पश्चिम बंगाल सरकार को ये सारी चीजें मंजूर नहीं हैं। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों के अधिकारों पर हस्तक्षेप की बात को भी सिरे से नकारते हुए कहा है कि उन्हें पता था कि विभिन्न राज्य इस तरह की शिकायत करेंगे, इसलिए एनसीटीसी के तहत एक स्थायी परिषद के गठन की बात पहले ही कही जा चुकी है, जिसमें एनसीटीसी प्रमुख के अलावा राज्यों के आतंक निरोधक बल के प्रमुख शामिल होंगे, ताकि किसी भी राज्य को कोई भी शिकायत होने पर परिषद में शामिल उनके प्रतिनिधि उस बात को रख सके। मंत्रालय का यह भी कहना है कि सरकारी निर्देशिका जारी करके एनसीटीसी एक मार्च से काम शुरू करने जा रहा है। देश में इससे पहले कभी इस तरह के उच्च क्षमता संपन्न संगठन का गठन नहीं हुआ है, इसलिए इसके काम शुरू करने के बाद ही पता चल सकेगा कि कहां क्या समस्याएं आ रही हैं। राज्यों की तरफ से शिकायत करने पर उस पर खुले मन से विचार किया जाएगा और एनसीटीसी की कार्य प्रणाली पर भी विचार किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर एनसीटीसी को कानूनी तौर पर स्वीकृति प्रदान की जाएगी।